शुक्रवार, 24 मार्च 2023

चमन चतुर

 

चमन चतुर

Synopsis

चमन और चतुर दोनों बहुत गहरे दोस्त हैं, और दोनों ही एक्टर बनना चाहते हैं. चमन और चतुर जहां भी जाते हैं, वहां कुछ न कुछ गड़बड़ कर के आजाते हैं. दोनों को बहुत अमीर बनना है लेकिन दोनों इतने बेवकूफ हैं कि एक बार दोनों ने एक चाय का स्टार्ट-अप करने की सोची तो ये दोनों वो चाय की दुकान भी ठीक से नहीं चला पाए. चीनी की जगह चाय में नमक डाल कर लोगों को पिला दी, और एक बार दूध की जगह फिनाइल चाय में डाल दिया.

दोनों की जिंदिगी ऐसे ही दुनिया और समाज से लड़ते झगड़ते, गुज़र रही होती है . लेकिन ये दोनों अपनी जिंदगी से बिलकुल भी परेशान नहीं है, ये दोनों अपनी जिंदगी को बहुत एन्जॉय कर रहे हैं. लेकिन गरीबी से अब परेशान हो गये हैं और अगले दिन इस मुंबई शहर को छोड़ कर जाने ही वाले होते है कि चमन को एक आइडिया आता है, वो चतुर से कहता यार कल हम इस शहर को छोड़ कर चले जायेंगे, क्यों न आज इस रात को सेलिब्रेट करें. तो दोनों फक्कड़ आदमी एक बार में जाते हैं और यहाँ इनकी किस्मत का एक नया दरवाज़ा खुलता है. और ये दोनों बेवकूफ लोग अपनी किस्मत की चाबी किसी और के हाथ में देकर फिर से ख़ाली हाथ अपने घर आजाते हैं. और बार की फ्री की दरु पी कर वहां मार खाते-खाते बचते हैं. 

लेकिन किस्मत के खेल से कौन बच सका है, जब किस्मत- चाबी आप के हाथ में देती है तो वो चाबी कहीं से भी घूम कर आप के हाथ में आ जाती है. और फिर से दोनों की किस्मत खुलती है . लेकिन इस बार ये उतना असन भी नहीं होता...

Written By:

Bhishak Mohan Sharma

शनिवार, 19 नवंबर 2022

Naina

आज मैं बहुत खुश हूं, पता है क्यों... क्योंकि आज मेरा सपना पूरा हो जाएगा... Yes, जिस बात का मुझे इतने सालों से इंतजार था वो आज हो गई... सोचो... सोचो... क्या नहीं सोच पाए...? चलो एक hint देती हूं... मुझे आज कॉल आया है... Yes, कॉल आया है? किस का? अरे आप अब भी नहीं समझे... आज मुझे अनुराग कश्यप जी का कॉल आया है। हां... वो गैंग्स ऑफ वासेपुर 3 बना रहे हैं और पता है उनकी लीड हीरोइन कौन है? जी हां... मैं और कौन? 
कॉल पर बोलते हैं, और सुनो नैना, मैं एक छोटी सी फ़िल्म बना रहा हूं... मेरी फिल्म में हीरोइन का रोल करोगी, अरे करलो ना...
मैंने कहा सर, आप "द अनुराग कश्यप" हो... ऐसे मत बोलो, आप तो बस ऑर्डर कीजिए कि आपके गुलाम को कब हाज़िर होना हैं हम तो तुरंत बम्बई आ जायेंगे फ्लाइट पकड़ के.... हाह... कितने साल लग गए इस एक छोटे से सपने को पूरा होने में... बॉलीवुड में हीरोइन बनने में... कितने साल मैंने मेहनत की, कितने कास्टिंग डायरेक्टरस से ऑफिसेज के चक्कर काटे, कितनों से मिन्नतें कीं... बस एक मौका, एक चांस मैं भी कुछ कर सकती हूं... लेकिन किसी ने मेरा टैलेंट नहीं देखा, देखा तो मेरा फिगर... किसी ने मुझ से मेरी मेहनत नहीं, मेरा काम नहीं पूछा... पूछा तो मेरे इंस्टाग्राम के फॉलोवर्स... लाइक्स, किसी ने मुझे रोल ऑफ़र नहीं किया, ऑफर किया तो वन नाइट स्टैंड... लेकिन आज मेरा टाइम आ गया, अब मैं दिखा दुंगी कि मैं भी कुछ हूं... Yes, Now I'm Going to be a Bollywood Star... Mumbai मैं आ रही हूं...

बात करो

आज कल के बच्चे पता नहीं क्या समझते हैं खुद को, मां बाप की एक बात नहीं सुनते... बस अपने आप में लगे रहते हैं। किसी से कोई मतलब नहीं ऐसा तो नहीं सिखाया था मैंने, मेरी बेटी कॉलेज आ कर सारा दिन अपने कमरे में बन्द रहती है, ज़रा ज़रा सी बात पर चीड़ जाती है, और मेरे बेटे की तो क्या बताऊं सारा दिन बाहर... सारी रात बाहर, रात को ग्यारह बारह बजे आएगा कहेगा की कॉलेज के असाइनमेंटस कर रहा था दोस्त के यहां... कुछ पूंछों तो दोनों कहते हैं मम्मा आप नहीं समझोगे... अरे क्या नहीं समझेंगे, तुम्हे पाल पोस कर इतना बड़ा इस लिए किया था क्या कि तुम हम से ये कहो कि आप नहीं समझोगे...क्या नहीं समझेंगे... 
मानती हूं कि ज़माना बदल गया है... हम old school हो गए हैं तो क्या? तुम एक बार हम से कह कर तो देखो बच्चा... हो सकता है हम न समझ पाएं, लेकिन एक बार हमें ट्राई तो कर के देखो, समझा कर तो देखो... अरे जब तुम छोटे थे एक बात को बार बार पूछते थे, एक ही सवाल दिन में चार बार... मम्मी ये क्या है... मम्मी ये क्या है... मम्मी ये पेड़ है क्या? मम्मी ये ताय है क्या? हम भी तो बताते थे न तुम्हे, बार बार समझते थे न... तो तुम क्यों नहीं हमें समझा सकते... क्यों बच्चा, क्यों...?

लीला

राम राम साब, साब आप से एक अरज थी... साब आपको तो पता है मेरा मरद दो साल हो गए जब सहर गया था... ससुरा तब का गया अब तक नहीं आया, ऊपर से अपनी जे औलादें और मेरे सिर छोड़ गया। हरिया गया था सहर, वो बता रहा था कि वहां किसी औरत के चक्कर में पड़ गया है... वैसे अच्छा ही हुआ साब जो छोड़ कर चला गया... कमीना...साला, रोज मुझे दारू पी कर मारता था और दारू के पैसे भी मेरे से ही लेता था... (कुछ देर सोच में) लेकिन जैसा भी था...तो मेरा मरद साब... साब आपसे एक वो थी वो अंग्रेजी में क्या कहते हैं, रिकवेस्ट थी साब... साब इस बार आप सहर जाओ तो क्या आपकी गाड़ी से मुझे ले चलोगे साब... साब मैं लोगों के चूल्हा चौका कर के इस गांव में बस इतना कमा पाती है कि मेरे दो बच्चों को दो टेम का निवाला खिला दे.. साब आपने मेरी बहुत मदद की है साब बस इतनी थोड़ी सी और मदद कर दो साब मैं मेरे मरद से मिल कर आपके साथ ही वापिस जाएगी...शुक्रिया साब,

शनिवार, 22 जनवरी 2022

सिर्फ़ मैं और तुम

सिर्फ मैं और तुम
कल्पना से भी बड़ा है ये संसार
घर ग्रह, गंगा-आकाशगंगा
लेकिन यहां सिर्फ तुम और मैं हैं
मानो जैसे चुना हो विधाता ने
हम दोनों को 
एक साथ जीने के लिए ये पल
हर लम्हा और जिदंगी
जो सिर्फ कुछ पल की है
ब्रम्हांड की गणना में
फिर भी साथ हैं
सिर्फ मैं और तुम

गुरुवार, 11 नवंबर 2021

ज़मीर

 ॐ श्री गणेशाय नमः

Screenplay

ज़मीर


Written By

Bhishak Mohan Sharma

bhishakmohan@gmail.com

9999401648




1. INT. A DARK ROOM, Day


(एक आदमी वाईट शर्ट ब्लैक पेंट में एक चेयर से बंधा है, बेशोह है, कोई ज़ोरदार पानी उसके चेहरे पर मरता है)


( पानी से Mr. MJ की बेहोशी टूटती है, थोड़ी सी आंखें खोल कर ऊपर देखता है)


(कैमरा सिर्फ एम जे को ही रिकॉर्ड के रहा है अभी)


एमजे: तुम...?

ज़मीर: तुम को क्या लगा था, इतने सालों की क़ैद और तुम्हारी मनमानी से में मर जाऊंगा?

एमजे: नहीं, तुम गलत समझ रहे हो

ज़मीर: समझ तो मुझे तब ही जाना चाहिए था, जब तुमने मुझे पहली बार मारने की कोशिश की थी, पर तब लगा की कर ही क्या सकते हो, यह काम ले चुके हो, ज़बान से फिर नहीं सकते।

लेकिन बाद में तो ये तुम्हारी आदत हो गई!

इसलिए वकील बने थे तुम?

एमजे: देखो हम आराम से भी बात कर सकते हैं...Man to Man talk?

ज़मीर: मेरी शक्ल पर चूतिया लिखा है? की मैं तुझे खोलूं और तू मुझ पर हमला कर दे?

एमजे: नहीं तुम ऐसा कैसे सोच सकते हो, तुम को क्यों मरूंगा मैं?

ज़मीर: (एक ज़ोरदार तमाचा एमजे के चेहरे पर मरता है)

झूठ से सख़्त नफ़रत है मुझे!

(एमजे गुस्से से आग बबूला हो कर ज़मीर की तरफ़ देखता है) 

(अब कैमरा ज़मीर को एमजे के (आई एंगल) लो एंगल से रिकॉर्ड करेगा, ज़मीर एमजे का हम शक्ल है, उसका आधा चेहरा जला हुआ है)

(ज़मीर उसकी आंखों में आंखें डाल कर, जले चेहरे से मुस्कुराते हुए देखता है, फिर जोर से उसके ऊपर दहाड़ता है, फिर हंसने लगता है)

ज़मीर: देख क्या रहे हो, यह मैं नहीं तुम हो।

जितनी ही बार तुम ने मेरे खिलाफ़ जा कर काम किया, हर बार तुम ने अपनी रूह को जलाया, मुझे जलाया।

अपनी आत्मा पर एक कला दाग लगाया...


याद है उस बूढ़ी औरत का चेहरा, जो लगातार तुम से, उस जज से, उन गवाहों से मदद मांग रही थी?

इंसाफ मिलेगा इस उम्मीद में, कचहरी में आई थी, भारत के संविधान पर भरोसा करके।

लेकिन तुम्हारे जैसे लालचखोरों की वजह से उस बुढ़िया की तरह हर बार भारत माता खून के आंसू रोती है।

एमजे: नहीं तुम सही कहते हो, मेरे से गलती हुई है मुझे पछतावा है।

अब खोल दो मुझे?

ज़मीर: (एक चांटा और मारते हुए) फिर झूंठ, तुम क्यों भूल जाते हो की मैं तुम्हारा ही हिस्सा हूं, 

एमजे: हां तो क्या हुआ...?, इस दुनिया में इतने सारे वकील हैं, जज हैं, इंजीनियर है, डॉक्टर हैं, घूसखोर अधिकारी हैं!

उनके पास जा! मेरे पास क्यों आता है।

ज़मीर: क्योंकि मैं तुम्हारा ज़मीर हूं ?

एमजे: तो मैं क्या करूं? वकील हूं मैं। मेरा पेशा है, गलत को सही और सही को गलत साबित करना? 

ज़मीर: और जज को गुमराह करना, बेगुनाह को सजा दिलवाना, गुनहगारों को बचाना?

एमजे: कौन क्या है? इसका फैसला करने के लिए जज हैं, मेरा जो काम है मैं वो करता हूं...केस लड़ता हूं

ज़मीर: तो हर बार किसी गलत आदमी को जिताने के बाद गरीबों को खाना क्यों खिलाते हो,

अपने ऊपर वाले से माफ़ी क्यों मांगते हो?

एमजे: मन करता है तो खिलाता हूं?

एमजे: तुम मुझे एक बात बताओ, ये तुम्हारे अन्दर बड़ी खुजली है, जो हर बार जाग जाते हो, और इस बार मुझे बांध कर रखा हुआ है, जान से मारने का इरादा है क्या?

ज़मीर: काश मैं ऐसा कर पाता?

एमजे: पर क्यों?, और भी तो लोग है दुनिया में, लेकिन मेरा ही ज़मीर क्यों मुझ से सवाल करता है?

ज़मीर: क्योंकि मैं तुम्हारे अंदर ज़िंदा रहना चाहता हूं, और तुम को भी जिंदा रखना चाहता हूं।

एमजे: अरे मुझे नहीं रहना तुम्हारे साथ ज़िंदा? कोशिश की थी शुरू में हमने, बात नहीं बनी न, भुखमरी में मारने की हालत हो गई थी, और कौन सही है कौन गलत के फेर में पड़ कर मेरा पेशा तो कभी नहीं चल सकता, सारी दुनिया ऐसी है मैं कोई अकेला नहीं हूं।

ज़मीर: पर अब तो तुम वापिस पहले वाले एमजे बन सकते हो, जो सच्चे लोगों के केस लेता था।

एमजे: फिर से सड़क पर आने के लिए, उधारी में जीने के लिए, अपनी बेटी को सरकारी स्कूल में पढ़ाऊंगा।

ज़मीर: तुम ने कभी सोचा है जिन लोगों को तुम आज़ाद करवाते हो, वो समाज के लिए गटर के कीड़ों से भी भयानक हैं, भेड़ियों से भी खतरनाक हैं।

एमजे: मुझे समाज से कुछ लेना देना नहीं है, Be practical आज का समाज सिद्धांत विद्धांत नहीं पैसा देखता है, इज़्ज़त करता है यह समाज मेरी।

ज़मीर: अगर सभी ऐसा सोचने लगेंगे तो सोचो कैसे रहोगे इस दुनिया में तुम

एमजे: सब ऐसा ही सोचते हैं

ज़मीर: सब ऐसा नहीं सोचते एमजे, अगर सब ऐसा सोचते होते, तो तुम्हारी बेटी रोज स्कूल से घर सही सलामत नहीं आजाती, तुम्हारी बीवी इतनी आज़ादी से लेट नाइट सेफ घर नहीं आ पाती।

एमजे: बस करो, इस सब के बीच में मेरे परिवार को मत लाओ।

ज़मीर: तुम्हारा क्या एमजे, इस सब के बीच में सभी का परिवार आता है।

ज़मीर: जो सड़क डेह जाती है, जो पुल टूट जाता है, उस पर तुम्हारी बीवी भी घर जाती है, और उसी पर तुम्हारी बेटी भी?

एमजे: बस करो ज़मीर, अब तुम लाइन क्रॉस कर रहे हो!

ज़मीर: तुम घूसखोरों को, कानून का उलंघन करने वालों को तुम बचाते हो, और कानून की बाजू बनने की बजाय उसे कमज़ोर करते हो, कभी सोचा है, वो कानून मजबूत रहेगा तभी तुम्हारा परिवार और समाज सुरक्षित रहेगा।

नहीं तो क्या पता समाज का कोई भेड़िया किसी दिन कानून की जंजीर तोड़ कर तुम्हारे ही घर पर हमला कर दे, तुम्हारी बीवी और बेटी को...

(इतना बोलते ही, एमजे कुर्सी से छूट कर ज़मीर पर टूट पड़ता है)

एमजे: (बोलते बोलते ज़मीर को मारता जाता है, और जान से मारने की हद्द तक पीटता है)

बोल रहा हूं, बस कर बस कर, फैमिली को बीच में मत ला, मार दूंगा जान से, मार दूंगा, मार दूंगा...( ज़मीर अधमरा सा हो गया है) मार दिया साले को...मार दिया...



2. INT. BED ROOM, NIGHT

एमजे: (बिस्तर पर बीवी के साथ लेटा है, नींद में, पसीने से तर बडबडा रहा है) मार दिया, मार दिया साले को, अब नहीं बोलेगा

बीवी:(नींद से जागते हुए) एमजे, क्या हुआ? किसे मार दिया।

एमजे:( बीवी को देखता है) तुम ठीक हो?

बीवी: तुम काम का ज्यादा स्ट्रेस मत लिया करो,आज कल ये क्रिमिनल्स के केस ज्यादा लेने लगे हो तुम, इधर आओ, कोई बुरा सपना देखा है तुम ने..

बीवी: (एमजे को गले से लगाती है)

(एमजे उसके गले लगता है, अंधेरे में पीछे दीवार के पास फोकस करता है, देखता है, उसका ज़मीर आधे जले चेहरे के साथ खड़ा है)

(एमजे पलक झपकाता है, ज़मीर एक सेकेंड में उसके नज़दीक आ जाता है: स्क्रीन ऑफ,)

वाइस ओवर: तुम मुझे नहीं मार सकते


टाइटल: ज़मीर

नंबरिंग

The End

सोमवार, 18 अक्टूबर 2021

चोर की मौत

हमारा नाम है गोपी मास्टर उंगलियों का जादूगर हूं मैं कैसे? चलते-चलते पैसे कमा लेता हूं, आदमियों की जेब, औरतों का पर्स, मेरी नजर से कुछ नहीं छुपता। अब तुम कहोगे कि मैं चोर हूं...तो जो आप मुझसे बचकर निकल भी जाएंगे तो इन साहूकार व्हाइट कॉलर, सूट-बूट कुर्ता पजामा पहने लोगों से कैसे बचेंगे इनमें और मुझ में बस इतना फर्क है कि जब यह आपके गली-मोहल्ले से गुजरते हैं तो आप उनके सामने सलाम ठोकते हैं और जब मैं आपके सामने पढ़ता हूं तो आप मुझे सिर्फ ठोकते हैं। रहने दो, अब आगे कहूंगा तो बुरा लग जाएगा... फर्क बस इतना है कि यह पढ़े लिखे पर्दे के पीछे के चोर हैं और मैं खुलेआम सामने चोरी करता हूं। सही-गलत के फर्क में मैं कभी पढ़ा नहीं मां-बाप का प्यार मुझे कभी मिला नहीं और स्कूल कभी गया नहीं



पिछले हफ्ते एक बुढ़िया को रोड क्रॉस कराया और उसका मेहनताना उसके पास से ले लिया, इतना बुरा भी नहीं हूं मैं ₹50 उसके पास में छोड़ दिए और मैं वहां से फरार।
कुछ रोज बाद मैंने उस बुढ़िया को सड़क के पास फटे हाल लोगों से खाना मांगते हुए देखा, पिछले हफ्ते ही तो जब उसे देखा था तो एकदम भली चंगी अच्छे घर की लग रही थी आज देखा तो बस ऐसा लगा कि शायद इसे पहचानता हूं थोड़ी देर बाद समझ आया कि यह तो वही बढ़िया है जिससे मेहनताना लिया था। मेरे पैरों के नीचे से जमीन सरक गई कुछ आसपास के लोगों से पूछा तो पता चला दिल्ली गेट के एक हॉस्पिटल में इसका लड़का एडमिट था तकरीबन 1 हफ्ते पहले इन्हीं लोगों से शाम के वक्त रो-रो कर 1800 ₹ मांग रही थी। 
बोल रही थी 'मेरे बेटे के लिए इंजेक्शन खरीदना है कोई कुछ पैसे दे दो नहीं तो मर जाएगा, मैं कल ला कर लौटा दूंगी, मेरे पास पैसे थे लेकिन किसी ने चोरी कर लिए', 
लोगों को ऐसा लगा जैसे भगवान टॉकीज पर 10-20 रुपए मांगने वाले ठोंग कर रहे होते हैं, की कोई भैया 10 रुपए दे दो, 20 रुपए दे दो, घर जाना है जेब कट गई है, ये बुढ़िया भी वैसे ही ढोंग कर रही है। तब किसी ने उसकी मदद नहीं की, लेकिन अगली सुबह उसके बेटे की मौत पता चला तब लोगों को यकीन हुआ, लोगों ने बताया कि बुढ़िया उसके बाद से घर ही नहीं गई, उसके परिवार में शायद बस एक बेटा ही था उसका, उसके बाद से बस अस्पताल के सामने बैठी रही तीन चार रोज़ तक। फिर इसकी जानवरों से भी बदतर हालत हो गई।
   मैंने एक दौना बेड़ई कचौड़ी खरीदी हमारे आगरा मथुरा सुबह का नाश्ता है यह, वो दौना लेकर में उस बुढ़िया के पास गया, हाथ आगे किया, खा लो माई मैं कहने ही वाला था की उसने मेरा बढ़ा हुआ हाथ उसकी ओर देखा और लपक के दोनों हाथों से दौना छीन लिया और खाने लगी। वो अपने बेटे की मौत से अपनी सुध बुध खो चुकी थी उसे खाते देख कर कोई यकीन ही नहीं कर सकता था की यह वही बुढ़िया है जो कुछ रोज़ पहले इतनी अमीर दिख रही थी। मैं उसे अपने साथ अपने कमरे पर ले आया। उसकी हालत देखकर अंदर से फूट-फूट कर रो रहा था बस वह आंसू आंखों से बाहर नहीं आ रहे थे। अब वो मेरे साथ ही रहती है और मैं अब चोरी नहीं करता मेहनत करता हूं। मेरी चोरी की वजह से एक मौत ने मेरे उस ज़मीर को ज़िंदा कर दिया जिसको में जनता भी नहीं था। लेकिन इन सफेदपोशों, air कंडीशन कमरों में बैठे मेहनतकशत लोगों की वजह से जो हजारों मौतें होती हैं उसका इन पर शायद कोई प्रभाव नहीं पड़ता, इनका ज़मीर कभी नहीं पलटता। मेरी जिंदगी का पहला खाना मुझे जो याद है, मैंने चोरी से खाया था लेकिन यह तय है कि मेरी मौत चोरी के खाने से नहीं होगी। उस बुढ़िया के बेटे की मौत के साथ मेरे अंदर के चोर की भी मौत हो गई।

रविवार, 5 सितंबर 2021

शिक्षक जो राह दिखाए

जीवन की राह में जो मार्ग दिखाए
सही गलत की जो पहचान कराए
शिक्षा से जीवन में प्रकाश जगाए
अपने नैतिक ज्ञान से 
जो जनमानस को सिंचता जाए,

स्वहित से परे जो सर्वप्रथम 
राष्ट्रहित सिखाए
वही जो तुम को
सत्यमेव जयते का पढ़ाए,

तिनका तिनका मानस से
वो राष्ट्र निर्माण करता जाए
संपूण जीवन जिसने केवल बांटा
जननी के बाद
जिसने तुम्हारे अवगुणों को छांटा,

सम्पूर्ण ब्रह्मांड में न कोई कर पाया, 
एक मात्र आचार्य हैं वो
जिसने अपने ज्ञान से संसार सजाया
जिसने अपने ज्ञान से संसार सजाया...

रविवार, 22 अगस्त 2021

मेरे पड़ोस में

मेरे पड़ोस में 
एक मकान छोड़ कर दूसरे मकान में
मुहम्मद अली उस्बेक का मकान है
मुहल्ले में मेरे कई कौमों के कई मकान हैं
अली की मुहल्ले में एक छोटी-सी दुकान है
उसके अब्बा-अम्मी, चार भाई शादी-शुदा,
चार बहनें कुंवारी, एक बीवी और बाक़ी औलादें हैं

माली हालत उसकी थोड़ी ख़ाली थी
नदी के उस पार चचा एंथोनी ने 
उसके घर की कश्ती संभाली थी,
घर का राशन, अस्पताली इलाज़ 
और चौथ वसूली वालों से 
चचा को सुरक्षा दिलानी थी

सेवादार थे 
अली के दो भाई, एक बीवी चचा के यहां
हमारे शहर में चचा का एक रुतबा है,
कई संस्थाएं हैं चचा की इन वसूलीदारों के खिलाफ

एक रोज़ वसूलीदार मुहम्मद अली उस्बेक के 
घर में घुस आए,
अली का बाप, जिसकी जिम्मेदारी थी घर को बचाना,
परिवार के लिए जरूरत पड़े तो मिट जाना,
वो छत छलांगता दूसरों के मकानों में 
छिपता नज़र आता है

मुहम्मद को चचा का भरोसा था कि चचा आयेंगे
लेकिन चचा का एक संदेशा आया
बच्चा वसूलीदाराें ने तुम्हारा घर है हथियाया
अब तुम को खुद ही लड़ना होगा 
नहीं तो उनके सामने सरेंडर करना होगा

दाने-दाने को मोहताज अली का परिवार,
बूढ़ी मां देखती है 
अपनी औलादों का नरसंहार
घर के कुछ मर्दों ने घोल दी अपनी खुद्दारी 
कुछ ने अपनी जान गवां दी बेचारी

उस्बेक ने एक परिंदे के पैरों में लंगर लटकाया,
आसमान में भर के उड़ान 
भाग निकलने का सपना सजाया,
बीच सफ़र में कहीं उसका हाथ छूटा 
नीचे जमीन पर गिरा वो 
जिंदगी से उसका साथ छूटा


वसूलीदारों ने मुहल्ले में विश्वास दिखाया
कहा घर चाहिए हमें ये
अब इसको हम पहले से बेहतर चलाएंगे
कुछ न कहेंगे इन औरतों को 
बस अपनी बात मनवायेंगे

मुहल्ले के भी कुछ घरों से आवाज़ आई
कोई बात नहीं भाई 
ये घर तो एक गुलाम था
तुमने इसे हथिया कर इसे आज़ादी है दिलाई
उस घर में औरतों को नोचा जा रहा था
मासूम बच्चियों को भी दबोचा जा रहा था
चीखों से सारा मोहल्ला देहला जा रहा था
मेरे और कुछ बाक़ी के घरों में भी बैचेनी थी
बच्चों के आंसू भी अब मकान से बाहर 
लाल रंग में 
बहते नज़र आते थे

लेकिन कुछ पड़ोसी थे जो अब भी 
उस मकान का मज़ाक उड़ा रहे थे,

उनके दर्द से मुहल्ले की दीवारें भी रो रहीं थीं,
दीवारों में दरारें थी मोहल्ले की
रात और दिन उस मकान से निकलती 
औरतों की चीखें थी,

मुहल्ले के कई घरों में 
अली के मकान की चिंता थी,
जिन-जिन को नहीं है हो सकता है 
कल उनके मकानों से भी वही चीखें न आएं, 
खैर ऐसा कभी न हो 

लेकिन
अब उस घर की कमज़ोर औरतों ने 
मुंह खोला था
साफ लफ्जों में खुल कर बोला था
मौत दो एक बार मंज़ूर है हमें,
तुम्हारी गुलामी में रोज़ नहीं मरना है
ये घर मेरा है
अब इसी में लड़ना है, 
इसी में मरना है

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

हेयर कट

साला कान पर से टोपा हटाता तब सुनाई देता ना, 
उसे चार बार बोला था 
'बाल छोटे मत करियो' 
एक बार तो उसके बॉस ने भी कह दिया 
भईया बाल बड़े रखते हैं छोटे मत करियो, जैसे कह रहे हैं वैसे ही करियो, 
साला पता नहीं क्या नशा करके बैठा था, कैंची ली और गुद्दी पर से कट...एक सेकंड में साला चार शॉट मार गया कच-कच-कच-कच, मैंने फिर कहा 'भाई छोटे नहीं करने हैं'
तो कहता है, 'नहीं भैया बस कर्ली बाल हटा रहा हूं'
फिर साला चार शॉट मार गया
कच-कच-कच-कच, 
मैंने कहा 'रुक जा, रुक जा काका रुक जा, कान पर से टोपा हटा और रुक जा' 
लेकिन क्या फायदा? तब तक तो भाई साहब बाल छोटे कर चुके थे। 
क्या फायदा?
इतने सालों से मेंटेन किया हुआ लुक, उस लॉलीपॉप-सी शक्ल वाले ने कर दिया खराब, फिर बाद में जैसे-तैसे सेट करवा कर यह ऊपर के चांद के बाल बचाये हैं, जो आपको यह मेरे सिर पर खड़े घौंसले जैसे दिखाई दे रहे हैं, उसके बॉस शंकर ने ही सेट किए थे। 

कहता है, 'भैया इसमें बड़े डीसेंट लग रहे हो'

दिल मैं आया एक झापड़ खींच कर दूं, 
'अबे लॉलीपॉप, तेरे चूज़े जैसे चेले ने मेरे इतने सालों का मेंटेन किया हुआ लुक खराब कर दिया... पैसे तो पूरे लेगा तू लपड़ झन्ने...
बहरहाल हम अपने नए लुक के साथ कॉलेज पहुंचे, ऐसा रिस्पांस तो हमें कभी नहीं मिला था, जिसे देखो वह कन्या हमारे विषय में वार्तालाप कर रही थी...

और फिर आई हमारे दिल की धड़कन...
वह सामने आती है तो बसंत ऋतु का आगमन हो जाता है, पेड़ों से पत्ते झड़ने लगते हैं...हवाएं चलने लगती हैं...और जैसा बॉलीवुड फिल्मों में होता है, गिटार और वायलिन बजने लगते हैं, वैसे ही मेरे दिल की धड़कन भी गिटार की स्ट्रिंग्स की तरह बजने लगती हैं
तिडिंग-तिडिंग-तिंग-तिंग-तिंग,
तिडिंग-तिडिंग-तिंग-तिंग-तिंग...

इतने सारे शोर के बीच उसने हल्के-से धीरे-से अपनी मधुर आवाज में कहा
'सुनो अच्छे लग रहे हो', 
'आय-हाय...अब तो तय कर लिया है, हेयर स्टाइल हमारा यही रहेगा... वैसे इतने बुरे भी नहीं काटे हैं, हमने अपने मोटरसाइकिल के शीशे में बालों को देखा...अरे ठीक नहीं बहुत अच्छे हैं।
चलिए अभी निकलते हैं, मैडम को ज़रा छोड़ कर आना है...
फिर मिलेंगे.

गुरुवार, 27 मई 2021

पीले दुपट्टे वाली

101...102...103...104...105... हाह...आज इससे ज्यादा नहीं हो पाएंगी,
हे बजरंगबली अपने भक्त की मदद करो!
क्या कमी रह गई मेरी श्रद्धा भक्ति में? 
बराबर तुम्हारी पूजा करता हूं, 
रोज़ बिलानागा सुबह 4:30 बजे उठ कर बराबर बर्जिस करता हूं,
इस ब्रज में कनहिया जी की धरती पर मैं तुम्हारा भक्त...
लेकिन फिर भी सौ से ज्यादा दंड नहीं मार पाता हूं,
क्यों प्रभु...क्यों? 
सक्ति दो प्रभु!
सक्ति दो!
.
.
.
ऐसा ही मगन मैं उस दिन अपनी बर्जिस में था। अपने बजरंगबली से बात कर रहा था, तभी पता नहीं कहां से हवा में उड़ता हुआ दुपट्टा मेरे ऊपर आकर गिर गया। ऐसी खुसबू तो मैंने आज तक नहीं सूंघी थी... अच्छा लगा पल भर के लिए, 
आहा, हा हा हा
तभी अचानक पता चला,
साला अपराध हो गया, हमसे तो घोर पाप हो गया!
ऊपर छज्जे से मौसी चिल्ला कर बोली, 
'अरे ओह पहलवान, जरा यह दुपट्टा तो ऊपर फेंकियो'  
हम तो एकदम सकपका गए... हमने दुपट्टे को गोल-मोल, गद-मद किया और जैसे ही ऊपर देखा, हाय... जिंदगी में पहली दफा हमारे मुंह से अंग्रेजी निकली...ओ-माय-गॉड...पीले दुपट्टे वाली कन्या मौसी के पीछे पीले सूट में खड़ी थी! 
अरे हम तो अटक गए।
मौसी फिर बोली, 
'अरे फेंक पहलवान, कैसे बुत बन कर खड़ा है' 
हमने दुपट्टा तुरंत ऊपर फेंका, ससुर मौसी की उंगलियों से छुलते-छुलते रह गया... हवा चली, फिर ऊपर आकर गिर गया, दुपट्टा हमारे चेहरे पर ऐसे गिरा जैसे हिमालय के पहाड़ों पर बर्फ़, आहा...हा...हा...हा...
ऐसा लगा जैसे किसी ठोस पत्थर पर सूरजमुखी का फूल उग आया हो। 
तभी अचानक मुंह से निकला, 
"जय बजरंगबली की" और हमें समझ आया कि ये तो हमारा धर्मांतरण होने जा रहा था! हम बजरंगबली के भक्त, श्री कृष्ण के मोहन रूप में प्रवेश होने जा रहे थे।
हमने तुरंत दुपट्टे को चेहरे से दूर किया, गद-मद किया, एक कस कर गांठ मारी और सीधा मौसी के मुंह पर निशाना लगा कर फेंक दिया।
बड़ा अपराध बोध फील हो रहा था।
हमने बजरंगबली से माफी मांगी और लगे दंड पेलने और पता ही नहीं चला, कब पेलते-पेलते हम दो सौ के पार हो गए, इतने दिन से सौ के पार करने की कोशिश कर रहे थे और आज एक सांस में दो सौ दंड मार लिए!
सोचने लगे पहले सौ और अब दो, बराबर हुए तीन सौ... वाह प्रभु वाह.. प्रभु हमसे नाराज नहीं हैं। 
अब ये दुपट्टे की शक्ति थी या बजरंगबली की भक्ति... नहीं बजरंगबली की भक्ति तो थी ही।
सोच रहे हैं कल भी दुपट्टा गिर जाए तो क्या पता 500 के पार हो जाए... हम बड़े प्रसन्न घर पहुंचे,

अम्मा ने कहा,
'लाला बाहर बरामदे में मिलबे बाए आए हैं, जाकर नेक बैठ जा बिन के बीच' 
और हम आज्ञाकारी भीम जाकर बैठ गए बरामदे में,
हाय... देखा पीले दुपट्टे वाली कन्या बैठी है हमारे सामने...
हमाए घर में, हमाए खिलाफ साजिस,
लेकिन इस साजिस का हम सिकार होना चाहते थे...

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

चुप क्यों रहते हो

चुप क्यों रहते हो
कुछ भी नहीं कहते हो 
कैसे सहते हो 
श्मशान में रहते हो या समाज में रहते हो 

सवाल रह-रहकर यही आता है 
इन दरिंदों को क्यों सहा जाता है 
शायद यह हमें हमारी बहन-बेटियों से ज्यादा प्यारे हैं
इसलिए साल दर साल यह बढ़ते जा रहे हैं 

यह दरिंदे कहां से आते हैं 
इनके हौसले क्यों इतने बढ़ जाते हैं 
खुलेआम यह अपना परचम लहराते हैं 
हैवानियत शर्मा जाए पर यह कहां शर्माते हैं 

प्रशासन का तो यह मखौल उड़ाते हैं 
कौन है जो इन को बचाते हैं 
वह कोख़ भी शर्मसार हो जाती है 
जो इनको दुनिया में लाती है 

क्या यह तादाद में हमसे ज्यादा है 
या शक्तिशाली समाज से ज्यादा है 
अगर नहीं तो हम क्यों इनसे ख़ौफ खाते हैं 
क्यों नहीं इनका कोई इंतज़ाम सजाते हैं 

रोश तो सभी जताते हैं 
अखबार, टीवी, सड़क सब जगह गुस्सा दिखाते हैं 
कानून भी आए दिन बनाते हैं 
फिर कहां हम हार जाते हैं 

जब तक इनको डराया नहीं जाएगा 
इनका हैवान पनपता जाएगा 
दरिंदों के खिलाफ जिस दिन 
समाज दरिंदगी के वक्त खड़ा हो जाएगा 
उस दिन यह सिलसिला थम जाएगा 

उसका शोर किसी के कानों में तो आया होगा 
बस,खेत, मकान या मैदान 
कोई तो चीखें ज़रूर सुन पाया होगा 

क्या शक्ल इस दुनिया को हिंदुस्तान दिखाएगा 
खुद को कैसे राम, कृष्ण, भगत, गांधी, सुभाष और आजाद का भारत कहलाएगा 

दुर्गा काली का खप्पर जब बाहर आएगा 
तभी नारी सुरक्षित समाज बन पाएगा 
शायद वह सीख हमने कुछ अलग तरह से मानी है 
बुरा न देखो, सुनो और कहो 
जो गांधी की जुबानी है 

इसलिए हर बार बस चुप्पी हमने ठानी है 
अरे क्या कहा था बापू ने और क्या हमने उनकी मानी है
बापू ने भी अब सोचा होगा 
ऐसा आजाद भारत तो ख्वाब में भी ना देखा होगा 

आज अपने ही अत्याचारी हैं
बहन बेटी लाचार बेचारी है 

कब भारत का जनमानस जागेगा 
जब इनकी हवस का प्रेत हर घर में नाचेगा
कुछ अब करना होगा 
इनकी हवस की बलि कब तक चढ़ना होगा 
इनकी हवस की बलि कब तक चढ़ना होगा...?

बुधवार, 9 सितंबर 2020

किट्टू

मैं रोज़ सुबह जल्दी उठने का आदी हूं। सुबह जल्दी उठता हूं, घर की छत पर जाता हूं और वहां टहलता हूं। कभी-कभी पड़ोस की छतों पर भी जाता हूं, बहुत सी लड़कियां तो सिर्फ मेरी वजह से ही छत पर सुबह जल्दी आती हैं, उनको मेरे साथ खेलना अच्छा लगता है और मुझे भी उनके साथ खेलना अच्छा लगता है। 
लेकिन सुबह मुझे सोनिया की बाहों से निकलने में बड़ी मुश्किल होती है, सारी रात मुझे बाजुओं में कस कर सोती है। ख़ैर कुछ दिन पहले मैं रोज की तरह उठा, छत पर गया और टहल रहा था कि मैंने उसे देखा...मेरी आंखें मानो मेरे चेहरे से निकलने को थीं... वाह!...क्या गज़ब की लगती थी वह।
छज्जे की मुलगेढी पर जब चलती थी तो लगता था कि रैंप वॉक कर रही है। मेरी आंखें और मुंह खुला का खुला रह गया । क्या कमाल की बिल्ली थी वह...अगर यह मेरी जिंदगी में आ जाए, तो मैं सारी कायनात इसके लिए छोड़ दूं। चौंक क्यों गए? 
मैं एक बिल्ला हूं तो बिल्ली पर ही तो मरूंगा ना। 
काश उस वक्त कुछ और मांगता तो शायद वह भी मिलता।
वो मेरे पास आई और हमारे बीच बहुत अच्छी-अच्छी मियाऊं-मियाउं यानी बातें हुईं।  मैं उसे चुपचाप अपने घर में नीचे ले गया, उसे पलंग के नीचे छुपा दिया।  सोनिया ने मुझे आवाज दी, "आ जाओ किट्टू, चलो दूध पी लो", मैंने सोनिया के जाने के बाद उसे बाहर बुलाया और अपना दूध पिलाया। 
सोनिया के बॉय फ्रेंड को बिल्लियां पसंद नहीं हैं पर वो सोनिया की वजह से मुझे कुछ नहीं कहता लेकिन एक और बिल्ली घर में देखते ही वह पागल हो गया। उसने मीनू पर गेंद से हमला किया। मेरी बेज्जती तो मैं सह लेता लेकिन मेरी प्रेमिका मीनू की बेज्जती मुझसे बर्दाश्त नहीं हुई। मैं तीन दिन तक घर नहीं गया।

मीनू की तरह ही उसके साथ सड़क पर रहा। कचरे के डिब्बे से खाना निकाल कर खाया, मीनू ने मुझे खाना ढूंढ़ना सिखाया। मैं जिंदगी में कभी खाली ज़मीन पर नहीं सोया, ठंडा नहीं गुनगुना दूध पिया है मैंने हमेशा ,
मैंने मीनू के लिए सब कुछ छोड़ दिया था लेकिन मीनू मुझे ही धोखा दे रही थी। तीसरे दिन मैंने उसे किसी दूसरे बिल्ले के साथ देखा...कैसे देखा मैं बता नहीं सकता... मुझे यकीन नहीं हुआ अपनी आंखों पर...और कल जब मैं घर आया तो मैंने देखा कि राजू घर में एक कुत्ता ले आया है। सोनिया मुझे भूल गई और अब उस कुत्ते के साथ खेल रही थी। अब उस घर में मेरे लिए कोई जगह नहीं है, मैं पालतू से आवारा बन गया हूं। अब मैं सड़कों पर जीना सीख रहा हूं, ख़तरनाक कुत्तों से बचना, लोगों के दरवाजों पर जाकर उन्हें अट्रैक्ट करना सीख रहा हूं। कुछ अच्छे लोग कभी-कभी मुझे दूध भी पिला देते हैं। काश अगर मैं बोल पाता तो उनसे कहता कि प्लीज़ मुझे पाल लो घर में,
घर में रख लो, मैं बड़ा प्यारा बिल्ला हूं, घर में रहना चाहता हूं। आपका मन लगा कर रखूंगा । प्लीज़... मुझे घर दे दो... कोई तो इस सिर पर छत दे दो...प्लीज...

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मृणाली

वो शक्ल से मासूम-सी, भोली-सी दिखने वाली साफ़ दिल की लड़की जिसने जिंदगी का लगभग हर दौर देखा था, लेकिन उसकी हल्की-सी भी झलक उसके चेहरे पर नहीं दिखती थी। लंबा-सा गोरा चेहरा, पतली-सी पीपनी जैसी मधुर आवाज़ और बनावटी मर्दानापन। 
अक्कड़ मिजाज़ी ही मेरे लिए उसकी पहचान थी।

मेरी दोस्ती किसी से जल्दी नहीं होती, लेकिन उससे पहली नज़र टकराते ही दोस्ती हो गई। मेरे दोस्तों ने मेरी खिंचाई शुरू कर दी, कि कॉलेज के फर्स्ट ईयर में ही थर्ड ईयर की सीनियर को फंसा लिया और फंसाया भी तो उसे जिसके आस-पास लड़के फटकने से भी डरते हैं। मैंने उन्हें समझाया, 
"अबे कमीनों, सिर्फ अच्छी दोस्त है मेरी",
तो उन्होंने उल्टा मुझे बॉलीवुड फिल्मों का एगज़ामप्ल देते हुए समझाया कि बेटे, "एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं होते"। आधा कचरा तो इन बॉलीवुड फिल्मों ने फैलाया है, पहले तो गुस्सा आया कि किस वाहियात-सी फिल्म का वाहियात-सा डायलॉग है? लेकिन फिर पता चला कि सल्लू भाई की फिल्म है, सोचा जाने दो, जब भाई को डायलॉग मारने से नहीं छोड़ा तो तुम क्या चीज हो प्रयाग पांडे।  गोली मारो ! हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंके हज़ार। 
हमारी दोस्ती भी बड़ी ही अजीब तरह से हुई, मैडम ने हमारे भोले- भाले दोस्त सतीश इलाहबादी के सबके सामने चांटा मार दिया। अब सतीश इलाहबादी जो हैं वो तोतले हैं, बेचारे कहना कुछ चाहते हैं और मुख-मंडल से निकलता कुछ और ही है। अब बेचारे ने मैडम को बोला, "गुड मॉर्निंग" लेकिन मुंह से निकला कुछ, मैडम ने समझा कुछ और धर दिया चांटा गाल पर बेचारे के...बस फिर क्या था, मियां इलाहबादी हमारे पास आए रोनी-सी सूरत लेकर। अब हमारे दोस्त के कोई चांटा मार दे, ये हमसे बर्दाश्त नहीं।  अब पिता जी हमारे दरोगा... आधे से ज़्यादा सीनियर तो हमारे मोहल्ले के थे, जिनमें से तीन-चार स्कूल में हमारे जूनियर थे। 
लेकर गए कैंटीन इलाहबादी को और कहा, 
"बताओ कौन है?" इलाहाबादी ने उंगली का इशारा किया। हमारा गुस्से से तिलमिलाता चेहरा देखकर कॉलेज में इलाके के सीनियर भी खड़े हो गए। उनके सामने जैसे ही हम खड़े हुए, उन्होंने तो कोई भाव ही नहीं दिया। 
हमने कहा, "सुनिए"... 
क्या एटीट्यूड था उनका, हमारी आवाज का तो मानो दम ही निकल गया। फिर तो हमारे मुंह से सिर्फ इतना निकला 

"गुड मॉर्निंग मैडम! हम प्रयाग पांडे, फ्रॉम फर्स्ट ईयर। उधर से सीनियर ने बोला था कि मैडम को विश करके आओ, विश कर दिया अब चलते हैं"। 

फिर क्या...? फिर तो दोस्ती हो गई, पता चला कि मैडम ने अब तक 200 से ऊपर लड़कों का दिल तोड़ा है और इस कतार में अब हमारा नंबर है।
वह बिल्कुल मेरी तरह थी... कोई नियम-कानून नहीं, बस जब जो करने का मन है वही करना है। अपनी कमाई से कॉलेज में लॉ (वक़ालत) कर रही थी, आठवीं के बाद घर से रुपए लेना बंद कर दिया था... क्योंकि पापा पोस्ट ऑफिस में नौकरी करते थे। दो छोटे-भाई बहन, अब भाई की भी  उम्र हो गई थी स्कूल जाने की, तो मृणाली को स्कूल छोड़ना पड़ा...बस उसकी बगावत वहीं से शुरु हो गई थी।
मैंने आज तक उसके जैसी लड़की नहीं देखी... घर का सारा काम करती थी, छोटे भाई-बहन को पढ़ाती थी, अकेले ही दुकान से घर तक गैस का भरा सिलेंडर लेकर आती थी। मतलब आज कल लड़के भी जितना काम नहीं करते, वो लड़की हो कर चुटकियों में कर देती थी।
मेरे अलावा सारे कॉलेज से अकड़ कर बात करती थी। बस मेरे आगे ही शांत हो जाती थी और मैं...? मैं तो अब मैं से हम पर आ गया था। अब किसी से लड़ाई झगड़ा करने की फुर्सत ही नहीं थी, सारा वक्त उसके साथ निकल जाता था। मैं उससे कहता, "इतना मत अकड़ा कर, कोई किसी दिन तेरी फाइल निपटा देगा।" 
तो वह बोलती, "अरे परागी लाल, अपने दम पर जीती हूं। किसी के बाप का डर नहीं मुझे, किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं कि हाथ लगा दे"। सच भी था, किसी की हिम्मत नहीं थी कि उसे हाथ लगा देता। 
उसका मानना था कि रिश्तो में मिलावट नहीं होनी चाहिए, इसलिए कभी अपने दिल की बात नहीं कहती थी। सिर्फ दोस्ती तक ही मामला रखती थी, लेकिन उस पागल को कौन समझाता कि हमारे रिश्ते में मिलावट तो हो चुकी थी। मैं तो फिर भी नहीं कहता, क्योंकि हमारा भी एक सपना था कि हम लड़की को नहीं, बल्कि लड़की हमारे पास आकर हमारा कॉलर पकड़े और बोले, "सुन बे तुझसे प्यार करती हूं, जा... जो करना है कर ले"। 
एक दिन बड़ी उदासी से मेरे पास आई, चेहरा उतरा हुआ था। बड़ी से बड़ी बात पर भी उदास नहीं होती थी। मैं पूछने ही वाला था कि, 
"क्या हुआ?"
उसने मेरा कॉलर पकड़ा, जोर से...थोड़ा मुझे झुकाया, थोड़ा खुद ऊपर उठी, उसकी आंखों में आंसू थे... बोली, "सुन, तुझसे बहुत प्यार करती हूं मैं और हमेशा करती रहुंगी। तुझे जो करना है कर लेना, बस मुझे भूलना मत कभी...थोड़ा सा और ऊपर उठकर मुझे होठों पर किस किया और बिन कुछ कहे उल्टे पांव लौट गई। उस दिन के बाद कॉलेज नहीं आई वो, वापस जाते वक्त उसके कदम बहुत भारी लग रहे थे। मैं उसके घर भी गया पर किसी ने बात नहीं की, दरवाज़े से ही लौटा दिया। बहुत पता करने की कोशिश की लेकिन...फिर कॉलेज में एक दिन उसकी सहेली ने बताया कि उसके पिताजी ने आत्महत्या की धमकी दी थी, क्योंकि वह शादी नहीं करना चाहती थी। उस दिन के बाद वो कहां गई, उसके घर वालों को भी नहीं पता। 
लेकिन मैं उसे आज तक ढूंढ़ रहा हूं...

मंगलवार, 30 जून 2020

हाथ उठाओ

सुनो तुम छिप कर रहना
अपना चेहरा न किसी को दिखाना 
अगर सामने है आना
तो हथियार साथ ज़रूर लाना

इस भ्रम में न रहना की 
ये मर्दों का समाज है
हर गली-मोहल्ले, चौराहे पर
सिर्फ नामर्दों की जमात है

मिलेगा कोई हज़ार में
एक मर्द
गीदडों के बीच शेर सा फंसा हुआ
सिर्फ उस एक के भरोसे भी बाहर न आना

अपना स्वाभिमान अगर है बचाना
तो खुद ऐसे हैवानों के खिलाफ
काली या दुर्गा बन कर बाहर आना
रक्त पात से तुम कतई न घबराना

वीर, शौर्य, साहस सब तुम से जन्म पाते हैं
इन नाली के गंदे कीड़ों को मसलने में देर न लगाना
जिस वक्त तुम्हारे हाथों इनका संघार होगा 
वही वक्त इनकी नस्ल का काल होगा

इसके लिए सीखनी होगी कला आत्म रक्षा की
सिर्फ वार से सुरक्षा की
क्योंकि गुहार इनको समझ नहीं आती 
समस्या ये है कि समाज को भी इन पर शर्म नहीं आती

शर्म आए भी कैसे 
दरवाज़े सारे उसके बंद है
नपुंसक हम हमाम में आधे से ज़्यादा नंगे हैं
अपने ज़हन के अंधेरे कमरों में सबने दामन चीरे हैं

कब तक ख़ुद की आज़ादी का मोल चुकाओगी
कब तक सब से गुहार लगाओगी 
तुम कब खुद के लिए अपना हाथ उठाओगी
तुम कब खुद के लिए अपना हाथ उठाओगी

शनिवार, 27 जून 2020

तकलीफ़

कहां से लाते हो हिम्मत जुर्म करने की
किसी बेगुनाह के साथ गुनाह करने की

ख़्याल क्या एक बार भी नहीं आता होगा
घर पर इनके भी तो माता, बहन, बेटी का साया होगा

ज़रूर उस मां ने आज सूनी कोख़ की गुहार की होगी
जब औलाद की ऐसी हैवानियत देखी होगी

अब दिन का जागना रात का सोना भी 
कितना खौफ़नाक होगा

अपने ही जिस्म से दरिंदों की हवस की बास का एहसास
हर पल ज़हन और जिस्म पर पड़े निशान

सवाल तो ख़ुदा से होगा उसका
किस गुनाह की सज़ा मिली उसको

औरत होना गुनाह हो गया उसका
क्यो सीता का तिनका उसको जन्म से ही न मिला

ये कैसा ईश्वर का अन्याय 
एक ओर सीता की छाया में भी इतना तेज

त्रिलोक विजयी छुए तो जल जाए
पर यहां जिसका मन वो तार तार कर जाए

उस दरिंदे ने भी कभी शायद 
दुर्गा के आगे सिर झुकाया होगा

पर वहां माता ने भी अपना फरसा नहीं चलाया होगा
सज़ा काफ़ी नहीं है दरिंदों की

इसलिए रोज़ ये सिर उठाते हैं
काश कोई ऐसा वक्त आए जहां ये कभी सिर ना उठाएं 

फिर कोई फूलन, निर्भया या दामिनी
हवस की शिकार न होने पाए

अब जब भी ऐसा कोई सामने आए
तो सिर्फ दुर्गा आए
तो सिर्फ दुर्गा आए...

सोमवार, 22 जून 2020

मौका परस्त काले नाग

पुरुषार्थ से भरा पुरुष देखना चाहते हैं
चरित्रवान, धैर्यवान, रघुकुल राम देखना चाहते हैं

हम धर्म वीर देखना चाहते हैं
हम तुम में सारी वीरता देखना चाहते हैं

तुम उठो बढ़ो और कहो 
बस यही हम तुम से चाहते हैं

महान उद्देश्य है हमारा
कुर्बानी हम तुम से चाहते हैं

आओ चलो साथ हमारे 
वीर तुम्हें बनाना चाहते हैं

नहीं हम में सवाल न दागो
सवाल तो हम दागने जाते हैं

तुम आखें मूंदे साथ दो
बस यही हम तुमसे चाहते हैं

हम ही सत्य की कसौटी हैं
ये समझना चाहते हैं

उठो तुम वीर बनो 
हम तुम को दागना चाहते हैं

हमारा नपुंसक हुआ पुरुषार्थ 
अब हम तुम्हारे भीतर चाहते हैं

तुम फूल सा नाज़ुक न समझो
फूल है तुम्हारे सीने में

हमारी मोटी चमड़ी न बदल सकी
तुम्हारी नाज़ुक खाल वो बदलेगी

हम तो यहीं है बैठे
और सदैव ही पांव जमाएंगे

हम तो काले नाग हैं
पुरुषार्थ की दुहाई से
तुम को डसते जाएंगे

आओ हमारे पास तुम 
तुमको जीवन का मूल्य हम सिखाएंगे...

गुरुवार, 18 जून 2020

एक कलाकार के नाम

कौन सही कौन ग़लत ये तो बस वो ही जाने
मेरा ख़ुदा तो बस किरदार का ईमान माने

बहस तुम्हारे जाने से भी छिड़ गई
मेरी वैचारिक क्षमता फिर एक साथी से भिड़ गई

उसने कहा तुम में कुछ अंश राजनीति का भी होना था
मैंने कहा मेरे दोस्त तुमको राजनीति में होना था

कलाकार से सिर्फ कला की मांग होती है
क्योंकि वही उसकी पहचान होती है

कला में राजनीति सिर्फ मक्कार करते हैं
क्योंकि वो कलाकार की ताक़त से डरते हैं

हर बाज़ी जीत जाएं ऐसा भी नहीं होता है 
कभी मंज़िल तो कभी रास्ता भी खोता है

ऐसे ज़िन्दगी से मुंह मोड़
कोई कब सोता है

शायद जब  सपनों का महल डेहता नज़र आए 
तभी ऐसा होता है ...

बुधवार, 17 जून 2020

मुलाक़ात

एक रोज़ उसने जब तुम्हारे बारे में बात की
उसके माध्यम से मैंने तुमसे मुलाक़ात की

तभी सोचा था कि एक रोज़ 
हकीक़त में मुलाक़ात होगी

उस रोज़ हम दोनों की 
जिज्ञासाओं और खोजों की भी बात होगी

सिर्फ तुम उस फेहरिस्त में शामिल थे
ऐसा भी नहीं था

एक मकबूल भी था 
तो एक इशान भी था

ख़ैर रह जाते है कई ख़्वाब अधूरे
कुछ आधे कुछ पूरे

एक रोज़ मिलेंगे वहां 
जहां सब को मिलना है 

ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी बाद भी चलना है
ज़िन्दगी क्या ज़िन्दगी बाद भी चलना है

शुक्रवार, 29 मई 2020

कमी तुम में नहीं है

कमी तुम में नहीं है 
कमी उन में है जो तुम में कमी ढूंढते हैं
क्योंकि वो सिर्फ तुम्हारे में ही नहीं
सभी में कमी ढूंढते हैं

पूरा तो कोई भी नहीं है
बेदाग तो चांद भी नहीं है
तुम कभी उनको चांद दिखा कर देखना
और कभी दिखा देना ताज महल भी

मेरे शहर में है 
दुनिया का एक नायाब अजूबा
उनका सवाल उल्टे तुम से ही होगा
उस दाग से भरे पिंड में क्या सुंदर दिखा
कैसी ये सफेद पत्थर की इमारत तुमने दिखाई
इस मकबरे में क्या खूबसूरती तुम को नज़र आई
ज़ालिम था वो जिसने इसे बनवाया
इसे बनाने वालों के हाथों को था उसने कटवाया

वो कहेंगे तुमको पहचान नहीं है
कभी चलो उनके मकान पर
वहां बनाई है उन्होंने छप्पर की एक झोंपड़ी
तुम एक बार को चकरा जाओगे
सीधे शाहजहां से सवालों की झड़ी लगाओगे

 ठहरो ख़ुद को यूं न उलझाओ
 कुछ पल दिल हटा कर दिमाग़ लगाओ
 कल जो कहा था उसने क्या वो आज निभाया
 अपनी बात पर क्या वो टिक पाया
 
तुमसे भी कभी किसी की शिकायत उसने लगाई थी
कल उन्हीं से उसने पहचान बढ़ाई थी
जो हर बात पर शिकायत लगाएगा
वह अपने साथ तुम्हें भी फंसाएगा

उनसे ख़ुद को बचाओ
ख़ुद पर भरोसा दिखाओ
उसे शिकायत है वो रहेगी 
तुम बस अपनी पहचान बनाओ
ख़ुद को आगे बढ़ाओ
ख़ुद को आगे बढ़ाओ

चमन चतुर

  चमन चतुर Synopsis चमन और चतुर दोनों बहुत गहरे दोस्त हैं, और दोनों ही एक्टर बनना चाहते हैं. चमन और चतुर जहां भी जाते हैं, वहां कुछ न कु...