रविवार, 5 सितंबर 2021

शिक्षक जो राह दिखाए

जीवन की राह में जो मार्ग दिखाए
सही गलत की जो पहचान कराए
शिक्षा से जीवन में प्रकाश जगाए
अपने नैतिक ज्ञान से 
जो जनमानस को सिंचता जाए,

स्वहित से परे जो सर्वप्रथम 
राष्ट्रहित सिखाए
वही जो तुम को
सत्यमेव जयते का पढ़ाए,

तिनका तिनका मानस से
वो राष्ट्र निर्माण करता जाए
संपूण जीवन जिसने केवल बांटा
जननी के बाद
जिसने तुम्हारे अवगुणों को छांटा,

सम्पूर्ण ब्रह्मांड में न कोई कर पाया, 
एक मात्र आचार्य हैं वो
जिसने अपने ज्ञान से संसार सजाया
जिसने अपने ज्ञान से संसार सजाया...

रविवार, 22 अगस्त 2021

मेरे पड़ोस में

मेरे पड़ोस में 
एक मकान छोड़ कर दूसरे मकान में
मुहम्मद अली उस्बेक का मकान है
मुहल्ले में मेरे कई कौमों के कई मकान हैं
अली की मुहल्ले में एक छोटी-सी दुकान है
उसके अब्बा-अम्मी, चार भाई शादी-शुदा,
चार बहनें कुंवारी, एक बीवी और बाक़ी औलादें हैं

माली हालत उसकी थोड़ी ख़ाली थी
नदी के उस पार चचा एंथोनी ने 
उसके घर की कश्ती संभाली थी,
घर का राशन, अस्पताली इलाज़ 
और चौथ वसूली वालों से 
चचा को सुरक्षा दिलानी थी

सेवादार थे 
अली के दो भाई, एक बीवी चचा के यहां
हमारे शहर में चचा का एक रुतबा है,
कई संस्थाएं हैं चचा की इन वसूलीदारों के खिलाफ

एक रोज़ वसूलीदार मुहम्मद अली उस्बेक के 
घर में घुस आए,
अली का बाप, जिसकी जिम्मेदारी थी घर को बचाना,
परिवार के लिए जरूरत पड़े तो मिट जाना,
वो छत छलांगता दूसरों के मकानों में 
छिपता नज़र आता है

मुहम्मद को चचा का भरोसा था कि चचा आयेंगे
लेकिन चचा का एक संदेशा आया
बच्चा वसूलीदाराें ने तुम्हारा घर है हथियाया
अब तुम को खुद ही लड़ना होगा 
नहीं तो उनके सामने सरेंडर करना होगा

दाने-दाने को मोहताज अली का परिवार,
बूढ़ी मां देखती है 
अपनी औलादों का नरसंहार
घर के कुछ मर्दों ने घोल दी अपनी खुद्दारी 
कुछ ने अपनी जान गवां दी बेचारी

उस्बेक ने एक परिंदे के पैरों में लंगर लटकाया,
आसमान में भर के उड़ान 
भाग निकलने का सपना सजाया,
बीच सफ़र में कहीं उसका हाथ छूटा 
नीचे जमीन पर गिरा वो 
जिंदगी से उसका साथ छूटा


वसूलीदारों ने मुहल्ले में विश्वास दिखाया
कहा घर चाहिए हमें ये
अब इसको हम पहले से बेहतर चलाएंगे
कुछ न कहेंगे इन औरतों को 
बस अपनी बात मनवायेंगे

मुहल्ले के भी कुछ घरों से आवाज़ आई
कोई बात नहीं भाई 
ये घर तो एक गुलाम था
तुमने इसे हथिया कर इसे आज़ादी है दिलाई
उस घर में औरतों को नोचा जा रहा था
मासूम बच्चियों को भी दबोचा जा रहा था
चीखों से सारा मोहल्ला देहला जा रहा था
मेरे और कुछ बाक़ी के घरों में भी बैचेनी थी
बच्चों के आंसू भी अब मकान से बाहर 
लाल रंग में 
बहते नज़र आते थे

लेकिन कुछ पड़ोसी थे जो अब भी 
उस मकान का मज़ाक उड़ा रहे थे,

उनके दर्द से मुहल्ले की दीवारें भी रो रहीं थीं,
दीवारों में दरारें थी मोहल्ले की
रात और दिन उस मकान से निकलती 
औरतों की चीखें थी,

मुहल्ले के कई घरों में 
अली के मकान की चिंता थी,
जिन-जिन को नहीं है हो सकता है 
कल उनके मकानों से भी वही चीखें न आएं, 
खैर ऐसा कभी न हो 

लेकिन
अब उस घर की कमज़ोर औरतों ने 
मुंह खोला था
साफ लफ्जों में खुल कर बोला था
मौत दो एक बार मंज़ूर है हमें,
तुम्हारी गुलामी में रोज़ नहीं मरना है
ये घर मेरा है
अब इसी में लड़ना है, 
इसी में मरना है

गुरुवार, 1 जुलाई 2021

हेयर कट

साला कान पर से टोपा हटाता तब सुनाई देता ना, 
उसे चार बार बोला था 
'बाल छोटे मत करियो' 
एक बार तो उसके बॉस ने भी कह दिया 
भईया बाल बड़े रखते हैं छोटे मत करियो, जैसे कह रहे हैं वैसे ही करियो, 
साला पता नहीं क्या नशा करके बैठा था, कैंची ली और गुद्दी पर से कट...एक सेकंड में साला चार शॉट मार गया कच-कच-कच-कच, मैंने फिर कहा 'भाई छोटे नहीं करने हैं'
तो कहता है, 'नहीं भैया बस कर्ली बाल हटा रहा हूं'
फिर साला चार शॉट मार गया
कच-कच-कच-कच, 
मैंने कहा 'रुक जा, रुक जा काका रुक जा, कान पर से टोपा हटा और रुक जा' 
लेकिन क्या फायदा? तब तक तो भाई साहब बाल छोटे कर चुके थे। 
क्या फायदा?
इतने सालों से मेंटेन किया हुआ लुक, उस लॉलीपॉप-सी शक्ल वाले ने कर दिया खराब, फिर बाद में जैसे-तैसे सेट करवा कर यह ऊपर के चांद के बाल बचाये हैं, जो आपको यह मेरे सिर पर खड़े घौंसले जैसे दिखाई दे रहे हैं, उसके बॉस शंकर ने ही सेट किए थे। 

कहता है, 'भैया इसमें बड़े डीसेंट लग रहे हो'

दिल मैं आया एक झापड़ खींच कर दूं, 
'अबे लॉलीपॉप, तेरे चूज़े जैसे चेले ने मेरे इतने सालों का मेंटेन किया हुआ लुक खराब कर दिया... पैसे तो पूरे लेगा तू लपड़ झन्ने...
बहरहाल हम अपने नए लुक के साथ कॉलेज पहुंचे, ऐसा रिस्पांस तो हमें कभी नहीं मिला था, जिसे देखो वह कन्या हमारे विषय में वार्तालाप कर रही थी...

और फिर आई हमारे दिल की धड़कन...
वह सामने आती है तो बसंत ऋतु का आगमन हो जाता है, पेड़ों से पत्ते झड़ने लगते हैं...हवाएं चलने लगती हैं...और जैसा बॉलीवुड फिल्मों में होता है, गिटार और वायलिन बजने लगते हैं, वैसे ही मेरे दिल की धड़कन भी गिटार की स्ट्रिंग्स की तरह बजने लगती हैं
तिडिंग-तिडिंग-तिंग-तिंग-तिंग,
तिडिंग-तिडिंग-तिंग-तिंग-तिंग...

इतने सारे शोर के बीच उसने हल्के-से धीरे-से अपनी मधुर आवाज में कहा
'सुनो अच्छे लग रहे हो', 
'आय-हाय...अब तो तय कर लिया है, हेयर स्टाइल हमारा यही रहेगा... वैसे इतने बुरे भी नहीं काटे हैं, हमने अपने मोटरसाइकिल के शीशे में बालों को देखा...अरे ठीक नहीं बहुत अच्छे हैं।
चलिए अभी निकलते हैं, मैडम को ज़रा छोड़ कर आना है...
फिर मिलेंगे.

गुरुवार, 27 मई 2021

पीले दुपट्टे वाली

101...102...103...104...105... हाह...आज इससे ज्यादा नहीं हो पाएंगी,
हे बजरंगबली अपने भक्त की मदद करो!
क्या कमी रह गई मेरी श्रद्धा भक्ति में? 
बराबर तुम्हारी पूजा करता हूं, 
रोज़ बिलानागा सुबह 4:30 बजे उठ कर बराबर बर्जिस करता हूं,
इस ब्रज में कनहिया जी की धरती पर मैं तुम्हारा भक्त...
लेकिन फिर भी सौ से ज्यादा दंड नहीं मार पाता हूं,
क्यों प्रभु...क्यों? 
सक्ति दो प्रभु!
सक्ति दो!
.
.
.
ऐसा ही मगन मैं उस दिन अपनी बर्जिस में था। अपने बजरंगबली से बात कर रहा था, तभी पता नहीं कहां से हवा में उड़ता हुआ दुपट्टा मेरे ऊपर आकर गिर गया। ऐसी खुसबू तो मैंने आज तक नहीं सूंघी थी... अच्छा लगा पल भर के लिए, 
आहा, हा हा हा
तभी अचानक पता चला,
साला अपराध हो गया, हमसे तो घोर पाप हो गया!
ऊपर छज्जे से मौसी चिल्ला कर बोली, 
'अरे ओह पहलवान, जरा यह दुपट्टा तो ऊपर फेंकियो'  
हम तो एकदम सकपका गए... हमने दुपट्टे को गोल-मोल, गद-मद किया और जैसे ही ऊपर देखा, हाय... जिंदगी में पहली दफा हमारे मुंह से अंग्रेजी निकली...ओ-माय-गॉड...पीले दुपट्टे वाली कन्या मौसी के पीछे पीले सूट में खड़ी थी! 
अरे हम तो अटक गए।
मौसी फिर बोली, 
'अरे फेंक पहलवान, कैसे बुत बन कर खड़ा है' 
हमने दुपट्टा तुरंत ऊपर फेंका, ससुर मौसी की उंगलियों से छुलते-छुलते रह गया... हवा चली, फिर ऊपर आकर गिर गया, दुपट्टा हमारे चेहरे पर ऐसे गिरा जैसे हिमालय के पहाड़ों पर बर्फ़, आहा...हा...हा...हा...
ऐसा लगा जैसे किसी ठोस पत्थर पर सूरजमुखी का फूल उग आया हो। 
तभी अचानक मुंह से निकला, 
"जय बजरंगबली की" और हमें समझ आया कि ये तो हमारा धर्मांतरण होने जा रहा था! हम बजरंगबली के भक्त, श्री कृष्ण के मोहन रूप में प्रवेश होने जा रहे थे।
हमने तुरंत दुपट्टे को चेहरे से दूर किया, गद-मद किया, एक कस कर गांठ मारी और सीधा मौसी के मुंह पर निशाना लगा कर फेंक दिया।
बड़ा अपराध बोध फील हो रहा था।
हमने बजरंगबली से माफी मांगी और लगे दंड पेलने और पता ही नहीं चला, कब पेलते-पेलते हम दो सौ के पार हो गए, इतने दिन से सौ के पार करने की कोशिश कर रहे थे और आज एक सांस में दो सौ दंड मार लिए!
सोचने लगे पहले सौ और अब दो, बराबर हुए तीन सौ... वाह प्रभु वाह.. प्रभु हमसे नाराज नहीं हैं। 
अब ये दुपट्टे की शक्ति थी या बजरंगबली की भक्ति... नहीं बजरंगबली की भक्ति तो थी ही।
सोच रहे हैं कल भी दुपट्टा गिर जाए तो क्या पता 500 के पार हो जाए... हम बड़े प्रसन्न घर पहुंचे,

अम्मा ने कहा,
'लाला बाहर बरामदे में मिलबे बाए आए हैं, जाकर नेक बैठ जा बिन के बीच' 
और हम आज्ञाकारी भीम जाकर बैठ गए बरामदे में,
हाय... देखा पीले दुपट्टे वाली कन्या बैठी है हमारे सामने...
हमाए घर में, हमाए खिलाफ साजिस,
लेकिन इस साजिस का हम सिकार होना चाहते थे...

रविवार, 4 अक्टूबर 2020

चुप क्यों रहते हो

चुप क्यों रहते हो
कुछ भी नहीं कहते हो 
कैसे सहते हो 
श्मशान में रहते हो या समाज में रहते हो 

सवाल रह-रहकर यही आता है 
इन दरिंदों को क्यों सहा जाता है 
शायद यह हमें हमारी बहन-बेटियों से ज्यादा प्यारे हैं
इसलिए साल दर साल यह बढ़ते जा रहे हैं 

यह दरिंदे कहां से आते हैं 
इनके हौसले क्यों इतने बढ़ जाते हैं 
खुलेआम यह अपना परचम लहराते हैं 
हैवानियत शर्मा जाए पर यह कहां शर्माते हैं 

प्रशासन का तो यह मखौल उड़ाते हैं 
कौन है जो इन को बचाते हैं 
वह कोख़ भी शर्मसार हो जाती है 
जो इनको दुनिया में लाती है 

क्या यह तादाद में हमसे ज्यादा है 
या शक्तिशाली समाज से ज्यादा है 
अगर नहीं तो हम क्यों इनसे ख़ौफ खाते हैं 
क्यों नहीं इनका कोई इंतज़ाम सजाते हैं 

रोश तो सभी जताते हैं 
अखबार, टीवी, सड़क सब जगह गुस्सा दिखाते हैं 
कानून भी आए दिन बनाते हैं 
फिर कहां हम हार जाते हैं 

जब तक इनको डराया नहीं जाएगा 
इनका हैवान पनपता जाएगा 
दरिंदों के खिलाफ जिस दिन 
समाज दरिंदगी के वक्त खड़ा हो जाएगा 
उस दिन यह सिलसिला थम जाएगा 

उसका शोर किसी के कानों में तो आया होगा 
बस,खेत, मकान या मैदान 
कोई तो चीखें ज़रूर सुन पाया होगा 

क्या शक्ल इस दुनिया को हिंदुस्तान दिखाएगा 
खुद को कैसे राम, कृष्ण, भगत, गांधी, सुभाष और आजाद का भारत कहलाएगा 

दुर्गा काली का खप्पर जब बाहर आएगा 
तभी नारी सुरक्षित समाज बन पाएगा 
शायद वह सीख हमने कुछ अलग तरह से मानी है 
बुरा न देखो, सुनो और कहो 
जो गांधी की जुबानी है 

इसलिए हर बार बस चुप्पी हमने ठानी है 
अरे क्या कहा था बापू ने और क्या हमने उनकी मानी है
बापू ने भी अब सोचा होगा 
ऐसा आजाद भारत तो ख्वाब में भी ना देखा होगा 

आज अपने ही अत्याचारी हैं
बहन बेटी लाचार बेचारी है 

कब भारत का जनमानस जागेगा 
जब इनकी हवस का प्रेत हर घर में नाचेगा
कुछ अब करना होगा 
इनकी हवस की बलि कब तक चढ़ना होगा 
इनकी हवस की बलि कब तक चढ़ना होगा...?

बुधवार, 9 सितंबर 2020

किट्टू

मैं रोज़ सुबह जल्दी उठने का आदी हूं। सुबह जल्दी उठता हूं, घर की छत पर जाता हूं और वहां टहलता हूं। कभी-कभी पड़ोस की छतों पर भी जाता हूं, बहुत सी लड़कियां तो सिर्फ मेरी वजह से ही छत पर सुबह जल्दी आती हैं, उनको मेरे साथ खेलना अच्छा लगता है और मुझे भी उनके साथ खेलना अच्छा लगता है। 
लेकिन सुबह मुझे सोनिया की बाहों से निकलने में बड़ी मुश्किल होती है, सारी रात मुझे बाजुओं में कस कर सोती है। ख़ैर कुछ दिन पहले मैं रोज की तरह उठा, छत पर गया और टहल रहा था कि मैंने उसे देखा...मेरी आंखें मानो मेरे चेहरे से निकलने को थीं... वाह!...क्या गज़ब की लगती थी वह।
छज्जे की मुलगेढी पर जब चलती थी तो लगता था कि रैंप वॉक कर रही है। मेरी आंखें और मुंह खुला का खुला रह गया । क्या कमाल की बिल्ली थी वह...अगर यह मेरी जिंदगी में आ जाए, तो मैं सारी कायनात इसके लिए छोड़ दूं। चौंक क्यों गए? 
मैं एक बिल्ला हूं तो बिल्ली पर ही तो मरूंगा ना। 
काश उस वक्त कुछ और मांगता तो शायद वह भी मिलता।
वो मेरे पास आई और हमारे बीच बहुत अच्छी-अच्छी मियाऊं-मियाउं यानी बातें हुईं।  मैं उसे चुपचाप अपने घर में नीचे ले गया, उसे पलंग के नीचे छुपा दिया।  सोनिया ने मुझे आवाज दी, "आ जाओ किट्टू, चलो दूध पी लो", मैंने सोनिया के जाने के बाद उसे बाहर बुलाया और अपना दूध पिलाया। 
सोनिया के बॉय फ्रेंड को बिल्लियां पसंद नहीं हैं पर वो सोनिया की वजह से मुझे कुछ नहीं कहता लेकिन एक और बिल्ली घर में देखते ही वह पागल हो गया। उसने मीनू पर गेंद से हमला किया। मेरी बेज्जती तो मैं सह लेता लेकिन मेरी प्रेमिका मीनू की बेज्जती मुझसे बर्दाश्त नहीं हुई। मैं तीन दिन तक घर नहीं गया।

मीनू की तरह ही उसके साथ सड़क पर रहा। कचरे के डिब्बे से खाना निकाल कर खाया, मीनू ने मुझे खाना ढूंढ़ना सिखाया। मैं जिंदगी में कभी खाली ज़मीन पर नहीं सोया, ठंडा नहीं गुनगुना दूध पिया है मैंने हमेशा ,
मैंने मीनू के लिए सब कुछ छोड़ दिया था लेकिन मीनू मुझे ही धोखा दे रही थी। तीसरे दिन मैंने उसे किसी दूसरे बिल्ले के साथ देखा...कैसे देखा मैं बता नहीं सकता... मुझे यकीन नहीं हुआ अपनी आंखों पर...और कल जब मैं घर आया तो मैंने देखा कि राजू घर में एक कुत्ता ले आया है। सोनिया मुझे भूल गई और अब उस कुत्ते के साथ खेल रही थी। अब उस घर में मेरे लिए कोई जगह नहीं है, मैं पालतू से आवारा बन गया हूं। अब मैं सड़कों पर जीना सीख रहा हूं, ख़तरनाक कुत्तों से बचना, लोगों के दरवाजों पर जाकर उन्हें अट्रैक्ट करना सीख रहा हूं। कुछ अच्छे लोग कभी-कभी मुझे दूध भी पिला देते हैं। काश अगर मैं बोल पाता तो उनसे कहता कि प्लीज़ मुझे पाल लो घर में,
घर में रख लो, मैं बड़ा प्यारा बिल्ला हूं, घर में रहना चाहता हूं। आपका मन लगा कर रखूंगा । प्लीज़... मुझे घर दे दो... कोई तो इस सिर पर छत दे दो...प्लीज...

गुरुवार, 6 अगस्त 2020

मृणाली

वो शक्ल से मासूम-सी, भोली-सी दिखने वाली साफ़ दिल की लड़की जिसने जिंदगी का लगभग हर दौर देखा था, लेकिन उसकी हल्की-सी भी झलक उसके चेहरे पर नहीं दिखती थी। लंबा-सा गोरा चेहरा, पतली-सी पीपनी जैसी मधुर आवाज़ और बनावटी मर्दानापन। 
अक्कड़ मिजाज़ी ही मेरे लिए उसकी पहचान थी।

मेरी दोस्ती किसी से जल्दी नहीं होती, लेकिन उससे पहली नज़र टकराते ही दोस्ती हो गई। मेरे दोस्तों ने मेरी खिंचाई शुरू कर दी, कि कॉलेज के फर्स्ट ईयर में ही थर्ड ईयर की सीनियर को फंसा लिया और फंसाया भी तो उसे जिसके आस-पास लड़के फटकने से भी डरते हैं। मैंने उन्हें समझाया, 
"अबे कमीनों, सिर्फ अच्छी दोस्त है मेरी",
तो उन्होंने उल्टा मुझे बॉलीवुड फिल्मों का एगज़ामप्ल देते हुए समझाया कि बेटे, "एक लड़का और लड़की कभी दोस्त नहीं होते"। आधा कचरा तो इन बॉलीवुड फिल्मों ने फैलाया है, पहले तो गुस्सा आया कि किस वाहियात-सी फिल्म का वाहियात-सा डायलॉग है? लेकिन फिर पता चला कि सल्लू भाई की फिल्म है, सोचा जाने दो, जब भाई को डायलॉग मारने से नहीं छोड़ा तो तुम क्या चीज हो प्रयाग पांडे।  गोली मारो ! हाथी चले बाजार, कुत्ते भौंके हज़ार। 
हमारी दोस्ती भी बड़ी ही अजीब तरह से हुई, मैडम ने हमारे भोले- भाले दोस्त सतीश इलाहबादी के सबके सामने चांटा मार दिया। अब सतीश इलाहबादी जो हैं वो तोतले हैं, बेचारे कहना कुछ चाहते हैं और मुख-मंडल से निकलता कुछ और ही है। अब बेचारे ने मैडम को बोला, "गुड मॉर्निंग" लेकिन मुंह से निकला कुछ, मैडम ने समझा कुछ और धर दिया चांटा गाल पर बेचारे के...बस फिर क्या था, मियां इलाहबादी हमारे पास आए रोनी-सी सूरत लेकर। अब हमारे दोस्त के कोई चांटा मार दे, ये हमसे बर्दाश्त नहीं।  अब पिता जी हमारे दरोगा... आधे से ज़्यादा सीनियर तो हमारे मोहल्ले के थे, जिनमें से तीन-चार स्कूल में हमारे जूनियर थे। 
लेकर गए कैंटीन इलाहबादी को और कहा, 
"बताओ कौन है?" इलाहाबादी ने उंगली का इशारा किया। हमारा गुस्से से तिलमिलाता चेहरा देखकर कॉलेज में इलाके के सीनियर भी खड़े हो गए। उनके सामने जैसे ही हम खड़े हुए, उन्होंने तो कोई भाव ही नहीं दिया। 
हमने कहा, "सुनिए"... 
क्या एटीट्यूड था उनका, हमारी आवाज का तो मानो दम ही निकल गया। फिर तो हमारे मुंह से सिर्फ इतना निकला 

"गुड मॉर्निंग मैडम! हम प्रयाग पांडे, फ्रॉम फर्स्ट ईयर। उधर से सीनियर ने बोला था कि मैडम को विश करके आओ, विश कर दिया अब चलते हैं"। 

फिर क्या...? फिर तो दोस्ती हो गई, पता चला कि मैडम ने अब तक 200 से ऊपर लड़कों का दिल तोड़ा है और इस कतार में अब हमारा नंबर है।
वह बिल्कुल मेरी तरह थी... कोई नियम-कानून नहीं, बस जब जो करने का मन है वही करना है। अपनी कमाई से कॉलेज में लॉ (वक़ालत) कर रही थी, आठवीं के बाद घर से रुपए लेना बंद कर दिया था... क्योंकि पापा पोस्ट ऑफिस में नौकरी करते थे। दो छोटे-भाई बहन, अब भाई की भी  उम्र हो गई थी स्कूल जाने की, तो मृणाली को स्कूल छोड़ना पड़ा...बस उसकी बगावत वहीं से शुरु हो गई थी।
मैंने आज तक उसके जैसी लड़की नहीं देखी... घर का सारा काम करती थी, छोटे भाई-बहन को पढ़ाती थी, अकेले ही दुकान से घर तक गैस का भरा सिलेंडर लेकर आती थी। मतलब आज कल लड़के भी जितना काम नहीं करते, वो लड़की हो कर चुटकियों में कर देती थी।
मेरे अलावा सारे कॉलेज से अकड़ कर बात करती थी। बस मेरे आगे ही शांत हो जाती थी और मैं...? मैं तो अब मैं से हम पर आ गया था। अब किसी से लड़ाई झगड़ा करने की फुर्सत ही नहीं थी, सारा वक्त उसके साथ निकल जाता था। मैं उससे कहता, "इतना मत अकड़ा कर, कोई किसी दिन तेरी फाइल निपटा देगा।" 
तो वह बोलती, "अरे परागी लाल, अपने दम पर जीती हूं। किसी के बाप का डर नहीं मुझे, किसी माई के लाल की हिम्मत नहीं कि हाथ लगा दे"। सच भी था, किसी की हिम्मत नहीं थी कि उसे हाथ लगा देता। 
उसका मानना था कि रिश्तो में मिलावट नहीं होनी चाहिए, इसलिए कभी अपने दिल की बात नहीं कहती थी। सिर्फ दोस्ती तक ही मामला रखती थी, लेकिन उस पागल को कौन समझाता कि हमारे रिश्ते में मिलावट तो हो चुकी थी। मैं तो फिर भी नहीं कहता, क्योंकि हमारा भी एक सपना था कि हम लड़की को नहीं, बल्कि लड़की हमारे पास आकर हमारा कॉलर पकड़े और बोले, "सुन बे तुझसे प्यार करती हूं, जा... जो करना है कर ले"। 
एक दिन बड़ी उदासी से मेरे पास आई, चेहरा उतरा हुआ था। बड़ी से बड़ी बात पर भी उदास नहीं होती थी। मैं पूछने ही वाला था कि, 
"क्या हुआ?"
उसने मेरा कॉलर पकड़ा, जोर से...थोड़ा मुझे झुकाया, थोड़ा खुद ऊपर उठी, उसकी आंखों में आंसू थे... बोली, "सुन, तुझसे बहुत प्यार करती हूं मैं और हमेशा करती रहुंगी। तुझे जो करना है कर लेना, बस मुझे भूलना मत कभी...थोड़ा सा और ऊपर उठकर मुझे होठों पर किस किया और बिन कुछ कहे उल्टे पांव लौट गई। उस दिन के बाद कॉलेज नहीं आई वो, वापस जाते वक्त उसके कदम बहुत भारी लग रहे थे। मैं उसके घर भी गया पर किसी ने बात नहीं की, दरवाज़े से ही लौटा दिया। बहुत पता करने की कोशिश की लेकिन...फिर कॉलेज में एक दिन उसकी सहेली ने बताया कि उसके पिताजी ने आत्महत्या की धमकी दी थी, क्योंकि वह शादी नहीं करना चाहती थी। उस दिन के बाद वो कहां गई, उसके घर वालों को भी नहीं पता। 
लेकिन मैं उसे आज तक ढूंढ़ रहा हूं...

मंगलवार, 30 जून 2020

हाथ उठाओ

सुनो तुम छिप कर रहना
अपना चेहरा न किसी को दिखाना 
अगर सामने है आना
तो हथियार साथ ज़रूर लाना

इस भ्रम में न रहना की 
ये मर्दों का समाज है
हर गली-मोहल्ले, चौराहे पर
सिर्फ नामर्दों की जमात है

मिलेगा कोई हज़ार में
एक मर्द
गीदडों के बीच शेर सा फंसा हुआ
सिर्फ उस एक के भरोसे भी बाहर न आना

अपना स्वाभिमान अगर है बचाना
तो खुद ऐसे हैवानों के खिलाफ
काली या दुर्गा बन कर बाहर आना
रक्त पात से तुम कतई न घबराना

वीर, शौर्य, साहस सब तुम से जन्म पाते हैं
इन नाली के गंदे कीड़ों को मसलने में देर न लगाना
जिस वक्त तुम्हारे हाथों इनका संघार होगा 
वही वक्त इनकी नस्ल का काल होगा

इसके लिए सीखनी होगी कला आत्म रक्षा की
सिर्फ वार से सुरक्षा की
क्योंकि गुहार इनको समझ नहीं आती 
समस्या ये है कि समाज को भी इन पर शर्म नहीं आती

शर्म आए भी कैसे 
दरवाज़े सारे उसके बंद है
नपुंसक हम हमाम में आधे से ज़्यादा नंगे हैं
अपने ज़हन के अंधेरे कमरों में सबने दामन चीरे हैं

कब तक ख़ुद की आज़ादी का मोल चुकाओगी
कब तक सब से गुहार लगाओगी 
तुम कब खुद के लिए अपना हाथ उठाओगी
तुम कब खुद के लिए अपना हाथ उठाओगी

शनिवार, 27 जून 2020

तकलीफ़

कहां से लाते हो हिम्मत जुर्म करने की
किसी बेगुनाह के साथ गुनाह करने की

ख़्याल क्या एक बार भी नहीं आता होगा
घर पर इनके भी तो माता, बहन, बेटी का साया होगा

ज़रूर उस मां ने आज सूनी कोख़ की गुहार की होगी
जब औलाद की ऐसी हैवानियत देखी होगी

अब दिन का जागना रात का सोना भी 
कितना खौफ़नाक होगा

अपने ही जिस्म से दरिंदों की हवस की बास का एहसास
हर पल ज़हन और जिस्म पर पड़े निशान

सवाल तो ख़ुदा से होगा उसका
किस गुनाह की सज़ा मिली उसको

औरत होना गुनाह हो गया उसका
क्यो सीता का तिनका उसको जन्म से ही न मिला

ये कैसा ईश्वर का अन्याय 
एक ओर सीता की छाया में भी इतना तेज

त्रिलोक विजयी छुए तो जल जाए
पर यहां जिसका मन वो तार तार कर जाए

उस दरिंदे ने भी कभी शायद 
दुर्गा के आगे सिर झुकाया होगा

पर वहां माता ने भी अपना फरसा नहीं चलाया होगा
सज़ा काफ़ी नहीं है दरिंदों की

इसलिए रोज़ ये सिर उठाते हैं
काश कोई ऐसा वक्त आए जहां ये कभी सिर ना उठाएं 

फिर कोई फूलन, निर्भया या दामिनी
हवस की शिकार न होने पाए

अब जब भी ऐसा कोई सामने आए
तो सिर्फ दुर्गा आए
तो सिर्फ दुर्गा आए...

सोमवार, 22 जून 2020

मौका परस्त काले नाग

पुरुषार्थ से भरा पुरुष देखना चाहते हैं
चरित्रवान, धैर्यवान, रघुकुल राम देखना चाहते हैं

हम धर्म वीर देखना चाहते हैं
हम तुम में सारी वीरता देखना चाहते हैं

तुम उठो बढ़ो और कहो 
बस यही हम तुम से चाहते हैं

महान उद्देश्य है हमारा
कुर्बानी हम तुम से चाहते हैं

आओ चलो साथ हमारे 
वीर तुम्हें बनाना चाहते हैं

नहीं हम में सवाल न दागो
सवाल तो हम दागने जाते हैं

तुम आखें मूंदे साथ दो
बस यही हम तुमसे चाहते हैं

हम ही सत्य की कसौटी हैं
ये समझना चाहते हैं

उठो तुम वीर बनो 
हम तुम को दागना चाहते हैं

हमारा नपुंसक हुआ पुरुषार्थ 
अब हम तुम्हारे भीतर चाहते हैं

तुम फूल सा नाज़ुक न समझो
फूल है तुम्हारे सीने में

हमारी मोटी चमड़ी न बदल सकी
तुम्हारी नाज़ुक खाल वो बदलेगी

हम तो यहीं है बैठे
और सदैव ही पांव जमाएंगे

हम तो काले नाग हैं
पुरुषार्थ की दुहाई से
तुम को डसते जाएंगे

आओ हमारे पास तुम 
तुमको जीवन का मूल्य हम सिखाएंगे...

चमन चतुर

  चमन चतुर Synopsis चमन और चतुर दोनों बहुत गहरे दोस्त हैं, और दोनों ही एक्टर बनना चाहते हैं. चमन और चतुर जहां भी जाते हैं, वहां कुछ न कु...