मंगलवार, 5 मई 2020

अंतर लॉ

जब चारों ओर अंधेरा हो
बस एक छोटे से दिए का सवेरा हो
हवा भी आएगी 
हिम्मत भी घबराएगी
तू उस दिए की लॉ को बचाना
तेरी लॉ ही तुझ को मंज़िल तक ले जाएगी
आसान है अपनी लॉ को बुझाना
और अंधकार में मिल जाना
निश्चित ही अंधकार चहूं ओर है
अभी भोर का सवेरा भी दूर है

लेकिन उस लॉ को छूना 
अनंत अंधकार के लिए भी सम्भव नहीं
इसलिए छलने का प्रयत्न करता है अंधकार
तेरी जीत की संभावनाएं हैं अपार
बस अंधकार का कर तिरस्कार 
अपनी अंतर लॉ से कर प्रहार
अपनी अंतर लॉ से कर प्रहार 
    

बुधवार, 22 अप्रैल 2020

कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते हैं

 चलो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते हैं
हर रोज़ धरा दिवस मनाते हैं, 

चलो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते हैं
प्रदूषण कम और वृक्ष ज़्यादा लगाते हैं,

चलो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते हैं
कंक्रीट के जंगलों में 
धरती माता का हरा आंचल बिखराते हैं,

चलो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते हैं
चलो कुछ ऐसी व्यवस्था बनाते हैं...

सावधान!

यदि मैं कहूं के सारे संसार का ज्ञान तुम्हारा है
और सभी प्रश्नों के उत्तर तुम को मिलजाएंगे 
आनन्द और धन भी अपार होगा 
शायद तुम्हारी बुद्धि से यही विकास व्यवहार होगा

लेकिन इसकी कीमत होगी तुम्हारी प्राण शक्ति
अब जी सकते हो केवल कुछ घंटे या दिन
कहो क्या भरोगे हामी ?

ना कहेंगे आप, मैं, सभी बुद्धिमान और धनवान
परंतु भविष्य यही है हमारे क्रिया कलापों का
आज घर है छिपने, जीने, सांस लेने को
सोचो अगर कल ये भी ना रहे तो कहां जाओगे 
शायद अंतरिक्ष में ही कहीं बस्ती बसाओगे 
पर क्या सभी को वहां लेजा पाओगे ?
वो तो अवश्य यहीं रह जाएगा 
जो तुम्हारी सेवा के काम ना आएगा

कुछ सीमित संसाधन ही आवश्यक हैं जीने के लिए
ये प्रकृति अपनी भाषा में समझा रही है
अब भी समझलो धरा क्या कहना चाह रही है

याचक थी दोनों हाथ जोड़े जो अब तक 
वो प्रकृति अब प्रहार की नीति अपना रही है
सावधान! 
क्योंकि अब मनुष्यों कि बारी आ रही है
विकल्प और भी हो सकते हैं सिवाय धरा के सौदे के
अभी समय है
सावधान!
याचक अब प्रहार की नीति अपना रही है।
हमारी खोजें, चाही और अनचाही रचनाएं
हमारे ही आड़े आ रहीं हैं
हो सकता है कि ये मात्र एक चेतावनी हो
सावधान!
क्या पता भविष्य में कोई संकट इससे भी भारी हो
सावधान...

सोमवार, 13 अप्रैल 2020

विज़न


रोज़ रात को कोई मेरे सपने में आकर मेरी चादर खींचता है, जैसे मुझे नींद से जगाने की कोशिश कर रहा हो। लेकिन जैसे ही मैं जागता हूं, चारों तरफ फिर से वही अंधेरा छा जाता है जो मेरी जिंदगी में छाया हुआ है।

"ऐसा होना कबसे शुरू हुआ आप के साथ?"

लगभग 10 दिन हो गए। पहली, दूसरी रात को तो मुझे लगा कि सच में कोई है... मैंने डर के बिस्तर से लात हवा में चलाई, लेकिन लात किसी के नहीं लगी। मुझे लगा वो जो कोई भी है पीछे हट गया होगा, मैं झट से मेरे सिरहाने रखी छड़ी की ओर झपटा और पूरे कमरे में चलाने लगा। मैं आवाज लगा रहा था - कौन है ? कौन है ? लेकिन कोई नहीं था, ना कदमों की आहट और ना हीं किसी की आवाज़। थोड़ी देर बाद थक कर, मैं अपने बिस्तर पर चौकन्ना हो कर बैठ गया कि शायद किसी के चलने की आहट हो, लेकिन ऐसा नहीं हुआ। मुझे बैठे-बैठे सुबह हो गई और सुबह तक भी कोई आहट नहीं हुई।
सुबह दूध वाला आया, तो मैंने सोचा की कोई होगा तो शायद दूध वाले को दिख जाए। दरवाज़े से किचन एक सीध में है, इसलिए मैंने पहले दरवाज़ा खोला और किचन की तरफ बढ़ कर दूध का बर्तन ढूंढने का नाटक करने लगा। थोड़ी देर बाद मैंने दूध वाले से कहा, "भैया मैं बर्तन ढूंढ नहीं पा रहा हूं, रखकर भूल गया हूं, आज किचन में ही बर्तन ढूंढ कर दूध रख दो।
दूध वाला किचन में आया और गैस के पास बर्तन देखकर बोला "अरे बाबू, दूध का बर्तन तो यहीं रखा है, गैस के बगल
में"।
"ओह..अच्छा, अरे पता नहीं चला ऐसा कैसे हुआ..मुझे मिल ही नहीं रहा था, कोई नहीं धन्यवाद दद्दा"।
"बाबा, सब ठीक है? कुछ परेशान लग रहे हो आज"।
मैंने कहा "नहीं तो! सब ठीक है", दूध वाला चला गया और मैंने कमरे की अंदर से कुंडी लगा दी। उस दिन में निश्चिंत था कि घर में कोई नहीं है।  मेरे ट्यूशन के बच्चे आए और चले गए। मैं बांसुरी और हरमोनिका (माउथ ऑर्गन) सिखाता हूं। मैंने शाम का खाना बनाया, खाया और सो गया। अगली रात को फिर वही एहसास हुआ, इस बार मैं कल से ज़्यादा डर गया था...लेकिन हिम्मत करके कमरे का एक-एक कोना टटोला, पर कोई नहीं था। मैं सोचने लगा कि ऐसा कैसे हो सकता है कि जब घर अंदर से बंद हो तब रात में कोई घर में घुसा चला आए और अगर दिन में भी आया हो तो इतने सब्र से मेरे सोने का इंतजार करें, जब मैं सो जाऊं तो सिर्फ जगाने आए और फिर से गायब हो जाए। ऐसा कैसे हो सकता है? या तो सच में कोई दोस्त बहुत ही मेहनत से मज़ाक कर रहा है या मेरे घर में कोई भूत है।
लेकिन जब ऐसा रोज़ होने लगा, तब मुझे ये यकीन हो गया कि इसके पीछे कोई दोस्त तो नहीं है और वैसे भी ज़्यादा दोस्त नहीं है मेरे।

"देखिए आप परेशान मत होइए, हम आपकी समस्या का समाधान ढूंढ लेंगे"।

"प्लीज़ डॉक्टर, मेरी जिंदगी में अब कोई नहीं है जिसको मेरी इतनी चिंता हो... और संध्या मेरी बहुत फिक्र करती है, मैं उसे परेशान नहीं देख सकता। उसे लगता है कि मैं पागल हो रहा हूं। उसे लगता है यह जो कुछ भी है, सिर्फ मेरे दिमाग की कोरी कल्पना है। संध्या सोचती है कि मेरी लाइफ में इतने ब्रेकडाउंस की वजह से ऐसा हो रहा है... देखिए मैं मानता हूं कि उस एक्सीडेंट में सिर पर चोट लगने की वजह से मेरी आंखें चली गई, लेकिन यह जो कुछ भी हो रहा है यह उस वजह से नहीं है"।
"देखो अमित, तुम अपने दिमाग पर ज़्यादा लोड मत लो, हम किस लिए हैं, संध्या मेरी अच्छी दोस्त है और यकीन करो, हम इसका इलाज निकाल लेंगे"।
उसने घंटी बजाई और कहा, "इनके साथ बाहर वेटिंग रूम में संध्या जी हैं, उनको बुलाओ"।
डॉक्टर संध्या को एक तरफ लेकर गई और उसने कहा "देखो संध्या...यह अपने सपने को सच मानना चाहते हैं और इनके बिलीव को हमें स्ट्रांग नहीं होने देना है"।
"लेकिन प्रिया, ये घर पर अकेले रहते हैं और मुझे डर है कि कुछ हो गया तो जब तक कुछ पता चलेगा तब तक कहीं देर नहीं हो जाए"। डॉ० प्रिया ने कहा, तुम घबराओ मत और ये दवाइयां अमित को खाने के लिए दो।

जब हम घर आए तो संध्या मेरे घर रुकने की ज़िद करने लगी, मैंने कहा "देखो संध्या मुझे इस बात से खुशी है कि तुम को मेरी फिक्र है लेकिन मैं अपना ख़्याल अकेले रख सकता हूं"I संध्या ने मुझ पर आवाज़ से चढ़ बनाते हुए कहा "नहीं तुम नहीं रख सकते", मैंने कहा "रख सकता हूं और अब तुम अपने घर जाओ",
"ठीक है रख सकते हो...मैं मानती हूं, लेकिन मुझे तुम्हारा ख़्याल रखना है"।
"एक दोस्त होने के नाते तुम जितना ख़्याल रख रही हो, उस नाते यह बहुत है... मेरे साथ हमेशा कोई नहीं रहता, मुझे अकेले रहने की आदत है, तो प्लीज..."
उसने अपनी उंगली मेरे होठों पर रख दी और बोली "देखो अमित तुम मुझसे जीत नहीं सकते, मैं एक लॉयर हूं और यह बहस तुमसे सारी रात कर सकती हूं। तो इस देश के एक अच्छे, समझदार और जिम्मेदार नागरिक होने के नाते चुपचाप मैं जहां बिठा रही हूं बैठ जाओ और अब यह लो", उसने मेरे हाथ में एक गोली दी, मैंने पूछा "यह क्या है?"
"नहीं कोई सवाल नहीं, चुपचाप आप इसे एक गिलास पानी से लेंगे"।
मैंने कहा "I object my lord"
उसने कहा "कोई होशियारी नहीं, सर। मुझे पता है आप बहुत स्मार्ट है, लेकिन यह होशियारी यहां नहीं चलेगी। यहां जज भी हम हैं और वकील भी ।
"तो मेरे पास बहस करने के लिए कोई मौका भी नहीं है?" "जी बिल्कुल नहीं"।
"यह तो तुगलकी फरमान हुआ"
"हां, कुछ ऐसा ही समझ लो"
"और अगर मैं ना मानूं तो?"
"सॉरी माई फ्रेंड, यू हैव नो चॉइस"
"यार देखो, मुझे दवाई नहीं खानी। मुझे बस उस सपने का मतलब समझना है... क्यों एक ही सपना हर रात मुझे आता है और कुछ नहीं करता सिर्फ मेरे ऊपर से चादर हटाता है?"
"तो तुम इतना डरते क्यों हो फिर, देखो अमित...सुनो, तुम्हारे सब पास विज़न (Vision) नहीं है, लेकिन तुम सपने देख रहे हो...क्यों ?
"वही तो मैं समझाना चाहता हूं तुमको, विज़न नहीं है इन आंखों के पास... लेकिन कहीं और विज़न बन रहा है और यार मैं जन्मजात अंधा नहीं हूं, मैंने पहले दुनिया देखी है। मैं आवाज़ के आधार पर तो कल्पना कर ही सकता हूं। I can imagine things, I can imagine you" मैं आवेग में बोल गया।


"Oh seriously! can you imagine me?"
तो बताओ मेरी आवाज़ के आधार पर, मैं क्या लगती हूं...
I mean कैसी लगती हूं?"
"तुम बिल्कुल तुम्हारी आवाज़ की तरह हो... मुझे लगता है तुम थोड़ी सी सॉलिड होगी, थोड़ी सी बॉडीबिल्डर टाइपस, जिस के डोले शोले होंगे, जो थोड़ी सी मोटी होगी और थोड़ी सी भारी भी"।
उसने चिढ़ते हुए कहा "अच्छा",
मैंने कहा "हां, अब तुम्हारी आवाज़ इतनी भारी और मर्दानी है, उस पर तुम इतना रोब जमाती हो, तो उस हिसाब से मुझे लगता है ऐसा ही होगा। वह चिढ़ते हुए बोली "just shut up", अब अभी के अभी तुमको ये खानी पड़ेगी।  "Now take it and sleep"
मैंने कहा,
"नहीं यार सुनो मैं तो मज़ाक कर रहा था, मैं अपनी बात चेंज करना चाहता हूं"...लेकिन अब वह कहां मानने वाली थी।
 "ना ! कोई सॉरी नहीं, बस यह गोली अंदर और तुम बिस्तर पर"।
मैंने गोली खा ली, मैंने कहा "देखा इसलिए बोला था कि मत रुको मेरे घर, अब सोओगी कहां?"
"Oh Shut up, तुम्हारे यहां डबल बेड है...तुम इधर, मैं उधर और बीच में तकिए...Now Sleep"
मैं लेट गया, उसने तकिये बीच में लगाए और वह भी लेट गई। मुझे काफी देर तक ऐसा लगता रहा कि वह मुझे देख रही है। थोड़ी देर बाद, मैंने गर्दन उसकी तरफ घुमाई तो उसने हल्की सी हरकत की, उसे ज़रूर लगा होगा कि मैं उसे देख रहा हूं और अब वह मुझसे शायद नज़र हटा चुकी थी ।

रात को तकरीबन दो बजे, नीचे सीढ़ियों के दरवाज़े पर आवाज़ हुई। मैं उठा.. चलता हुआ दरवाजे पर पहुंचा... दरवाजा खोला, तो देखा वहां कोई नहीं था। अचानक मुझे याद आया कि संध्या कमरे में अकेली है, मैं दौड़ता हुआ ऊपर आया और मैंने देखा कि कोई एक साया संध्या की चादर खींच रहा था।  मैंने तुरंत मेरी छड़ी को ढूंढना शुरू कर दिया और मुझे याद आया कि छड़ी मेरे सिरहाने रखी होती है । मैं छड़ी की ओर बढ़ा और मैंने पकड़ ली। छड़ी पकड़ते ही मुझे एहसास हुआ कि मैं देख नहीं सकता और  चारों तरफ अंधेरा छाने लगा। मैं उस साए को मारने के लिए छड़ी घुमाने लगा और बोल रहा था कि "कौन... कौन है?" संध्या भड़भड़ा कर उठी और उसने उठते ही मेरी छड़ी पकड़ ली और बोली "कोई नहीं है, नहीं है कोई... नहीं बस... शांत...सब सपना था... कोई नहीं है"।
"मैंने कहा नहीं वहीं था, इस बार तुम्हारी चादर खींच रहा था"। संध्या ने कहा "मेरे पास चादर नहीं है अमित, शांत हो जाओ"।
वह लगातार मेरे सिर पर हाथ फिरा रही थी, उसने मेरा सिर अपनी छाती से लगा रखा था। थोड़ी देर बाद उसने मुझे पास में रखे जग से गिलास में पानी डाल कर दिया, "लो, पानी पी लो"। पानी पीने के थोड़ी देर बाद उसने पूछा "अब कैसा महसूस हो रहा है...बैटर ?"
मैंने कहा "हां !" थोड़ी देर बाद मैंने उससे कहा "सुनो मुझे लगता है तुम ठीक थी... शायद यह मुझे कोई दिमागी परेशानी ही है, कल चलकर डॉक्टर को दिखाऊंगा, अब दवाई भी खाऊंगा। मैंने दवाई दांतो के बीच फंसा कर पानी पी लिया था, बाद में थूक दी थी...सॉरी !"
संध्या ने कोई हार्ड रिएक्शन नहीं दिया और बोली,"कोई बात नहीं"। मैंने फिर थोड़ी देर बाद पूछा "तुम क्यों मेरी इतनी चिंता करती हो?"
उसने कहा "क्योंकि तुम मेरे दोस्त हो इसलिए और एक दोस्त हमेशा दूसरे दोस्त की मदद के लिए तैयार रहता है। तुमको याद है, हम पहली बार कब मिले थे ?" मैंने कहा "हां! पार्क में जब तुम्हारा कुत्ता मुझ पर भोंकते हुए झपट पड़ा था और तुम बार-बार सॉरी- सॉरी बोल रहीं थीं...फिर तुमने पूछा कि अब आप क्या करते हैं तो मैंने बताया, Now I follow my another dream...मैं बच्चों को बांसुरी और हर्मोनिका सिखाता हूं"।
संध्या बोली "हां, फिर तुम ने बताया कि तुम वहां पॉकेट 'C' में रहते हो और मेरे पड़ोसी भाटिया अंकल का पोता भी तुम से सीखता है।"
मैंने कहा "हां"
वो बोली "लेकिन मैं तुमको उससे भी पहले से जानती हूं।" मैंने पूछा, "मतलब?"
उसने कहा "मतलब यह कि मैं राजीव की लॉयर थी, उस दिन जब तुम अपने वकील को केस वापस लेने के लिए बोलने आए थे, तब मैं तुम्हारे लॉयर से बात कर रही थी। तुम आए और तुम ने कहा, वकील साहब केस वापस ले लीजिए मुझे राजीव से कोई शिकायत नहीं है, उसने जो किया गलती से किया जानबूझकर नहीं। तुम्हारे वकील ने तुमको बहुत कन्वेंस करने की कोशिश की, कि तुम्हारा केस बहुत स्ट्रॉन्ग है। लेकिन तुम डिसाइड करके आए थे, तुमने कहा मुझे उससे कोई शिकायत नहीं है और जब शिकायत नहीं है तो उसे सजा किस बात के लिए दिलवाऊं।
उस दिन मैंने एक ऐसा इंसान देखा, जो मैंने अपनी जिंदगी में कभी नहीं देखा था। मैं आज तक सोचती हूं कि कोई किसी इतना बुरा करने वाले के साथ ऐसा कैसे कर सकता है । जबकि उसकी गलती थी, वो ड्रिंक करके ड्राइविंग कर रहा था, तो उसको सजा मिलनी चाहिए थी।
मैंने कहा "उसको जितनी सज़ा मिलनी थी मिल गई और मुझे सच में उससे कोई शिकायत नहीं थी, इसलिए मैंने केस वापस ले लिया। दूसरा मौका सबको मिलना चाहिए, उसे सजा दिलवाकर मेरी आंखें वापस नहीं आ सकती। केस वापस लेने के बाद वो मेरे घर आया था, रो रहा था। उसे सच में अपनी गलती का एहसास था और पश्चाताप करने वाले को तो मौका मिलना ही चाहिए ना । वैसे भी संजना के जाने के बाद, मैं जिंदगी को अलग तरह से देखने लगा हूं"।

"तुमने कभी अपनी पास्ट लाइफ के बारे में डिस्कस नहीं किया" संध्या ने जानने के लिए पूछा,
"क्या करोगी जानकर, वह सब इतना इंटरेस्टिंग नहीं है"। उसने जोर देते हुए कहा, "लेकिन फिर भी दोस्त होने के नाते, हमें एक दूसरे के बारे में पता होना चाहिए, बस इसीलिए"।
मैं समझ गया था कि वह संध्या के बारे में जानना चाहती है और वह मानेगी नहीं, धीरे-धीरे कुरेदती रहेगी। तो मैंने सीधे पॉइंट से ही कहानी शुरू की।
"संजना मेरे साथ कॉलेज में पढ़ती थी, मैं थोड़ा सा पॉपुलर था और कॉलेज में लड़कियां मुझे पसंद करती थी।
मेरे और योगी के बीच हमेशा खींच-तान चलती रहती थी, इसकी दो वजह थीं- पहली, कि जिस किसी भी लड़की को वह पसंद करता था, वह या तो मुझे पसंद करती थी या मेरी short-term गर्लफ्रेंड रह चुकी होती थी। दूसरी वजह थी बॉक्सिंग, बॉक्सिंग में हमेशा वो मेरे ऑपोजिट होता था और हर मैच हारता था। हां मैं बॉक्सर था, स्टेट लेवल तक खेला था मैंने । हां तो मैं कह रहा था "कॉलेज में संजना का पहला दिन था। मैं, योगी और चेतन हम तीनों की नज़र उस पर पड़ गई। चेतन तो अपने आप पीछे हट गया, कि चल भाई अमित तेरे लिए। चेतन मेरे लिए कुछ भी कर सकता था। योगी और मेरे बीच शर्त लगी और तय हुआ कि जो भी शर्त हारेगा, वह कभी संजना के सामने नहीं फटकेगा। अब शर्त यह थी कि चेतन ने हम दोनों को एक- एक केला दिया, जो हमें अवंतिका मैम को खिलाना था और जो पहले केला खिलाएगा वो जीतेगा। हर कॉलेज में कोई ना कोई एक ऐसी फैकल्टी होती है जिसके लिए स्टाफ से लेकर स्टूडेंट सब का दिल धड़कता है, आसपास गिटार बजने लगते हैं, पत्ते झड़ने लगते हैं, हमारे कॉलेज में थीं अवंतिका मैम। सच में... मैं हूं ना फिल्म की सुष्मिता सेन लगती थीं। हां, तो अब हम दोनों में दौड़ लगी...योगी शॉर्टकट लेकर admin department में अवंतिका मैम के पास पहुंच गया और सीधे केला उनके सामने करते हुए बोला "मैम आपके लिए"।
हां! उसकी बोलने के कला में कुछ गड़बड़ थी। मैम भड़क गई और उसको डायरेक्टर ऑफिस ले जाने लगीं। मैंने योगी को डांट खाते हुए देखा, तो तुरंत गेंदे का फूल बाहर लगे गमले से तोड़ा, एक कागज में मिट्टी डालकर पुड़िया बनाई और मैम को जाकर गुड मॉर्निंग विश किया,
 "हेलो मैम गुड मॉर्निंग,
 हैप्पी ट्यूसडे"
  मैम ने मुझे देखा और बोली,"ओ! हेलो अमित कैसे हो, आज बड़े खुश लग रहे हो क्या बात है।
  मैंने कहा "जी मैम, वह आज ही मौसी- मौसा जी सीधे वैष्णो देवी से आए हैं और माता का प्रसाद मैं सबसे पहले आपके लिए लाया हूं। मैंने गेंदे का फूल मैम के हाथ में दिया, कागज में जो गमले की मिट्टी डाली थी उससे उनका टीका किया और केले को दो भागों में मैम के हाथ में दे दिया।  मैंने कमरे के बाहर ही केले को स्केल से काट लिया था। Oh! how sweet of you  बच्चा, मैम उम्र में भी ज़्यादा नहीं थीं, मुश्किल से 25-26 की होंगी, लेकिन लड़के हवा में ज़्यादा ना उड़ें इसलिए उनको बच्चा-बच्चा बुलाती थीं।  थोड़ी देर बात-चीत के बाद उनकी नज़र योगी पर पड़ी, जो मुझे देख कर जल रहा था, वो फिर गुस्से से भर कर बोली "चलो हटो, मुझे आज योगी को डायरेक्टर सर के पास ले जाना है...इसके कुछ ज्यादा पर निकल आए हैं"। मैंने कहा "जी मैम, सच में इसके बहुत ज़्यादा पर निकल आए हैं। अब देखिए! यह प्रसाद छीन कर, मुझसे पहले आपको खिलाने आ रहा था। बताइए ऐसे भी कोई करता है। मुझे यकीन है कि जरूर कुछ बदतमीज़ी की होगी इसने"।
 "अमित मुझे पता है, तुम इसको बचाने की कोशिश कर रहे हो"
 "अरे सॉरी मैम... मैं इसको बचा नहीं रहा, यह आपके और मेरे बीच में आ रहा था, मैं क्यों बचाऊंगा इसको।
 मैम मेरी तरफ देख कर अपनी मुस्कुराहट को रोकते हुए बोलीं, तुम सच में बहुत स्मार्ट हो", मैंने स्माइल किया।
मैम योगी से बोलीं, "चलो भागो यहां से और बच्चे कुछ सलीका, कुछ तमीज़ सीखो बात करने की, अमित को देखो। योगी ऐसे भागा जैसे गोली, मैम मेरी तरफ आई, मेरा कान पकड़ा और बोली " मुझे सब पता है...तुम सच में स्मार्ट हो, बचा लिया उसको...चलो अब भागो यहां से ।
उसके बाद मेरे और संजना के बीच में कोई कभी नहीं आया। मैंने अपना बी०ए० पूरा किया और 6 महीने में नेशनल खेलने की तैयारी कर रहा था। हम दोनों का प्लान फिक्स था। वह मेरे साथ लिव-इन में रह रही थी और उसका कॉलेज पूरा होने में सिर्फ 3 महीने बचे थे, उसके बाद हम शादी करने वाले थे। मेरा अपने दोस्तों के साथ किराए पर मीडिया इक्विपमेंट्स देने का बिजनेस था। सब सेट था। उस दिन रात को, मैं और संजना खाना खा कर वॉक पर निकले थे। सड़क पूरी खाली थी, साइड में ऑटो पार्किंग में खड़े थे। सामने एक कार तेज़ रफ़्तार से आ रही थी, उसका बैलेंस खो चुका था।  मैंने कार को हमारी तरफ़ आते देखा और संजना को एक तरफ धकेल दिया। कार ने मुझे साइड से टक्कर मारी और मैं सीधे ऑटो से टकरा गया। होश आया... तो मैं हॉस्पिटल के बिस्तर पर था। मुझे दोस्तों और संजना की आवाज़ सुनाई दे रही थी बस, मैंने बताया कि मैं कुछ देख नहीं पा रहा हूं। चारों तरफ सिर्फ अंधेरा और शोर सुनाई दे रहा था। कुछ समझ में नहीं आ रहा था, मैं चींख रहा था, कुछ हाथों ने मुझे कंधों से पकड़ लिया, कुछ ने मेरा सिर पकड़ा, कुछ ने मेरे पैर पकड़े और मुझे अचानक से नींद आ गई। फिर बाद में जब होश आया तब कान में संजना की आवाज आई, उसने कहा "घबराओ नहीं"। उसने मेरा हाथ कस कर पकड़ रखा था। मैंने कहा, "मैं कुछ भी नहीं देख पा रहा हूं संजू, इससे तो अच्छा मैं मर जाता"। वह फूट-फूट कर रो पड़ी और बोली "चिंता मत करो अमित... मैं हूं तुम्हारे साथ हमेशा"। जब हॉस्पिटल से छूटा, तो मेरे हाथों में एक छड़ी आ गई। मेरे बिजनेस पार्टनर राजेश ने मुझे एक चश्मा लगा दिया, लेकिन मुझे ये चश्मा बिल्कुल पसंद नहीं था क्योंकि उस चश्मे का मकसद मैं जानता था। बहुत छोटा था, तभी मां को खो बैठा था। जिंदगी को जीना... ज़िन्दगी से लड़ना... सब पापा ने सिखाया। 6 महीने हुए, जब वह भी छोड़ कर चले गए और अब यह आंखें छोड़ कर चली गईं। इतना सब कम था...धीरे-धीरे मुझे वह सब भी छोड़ कर चले गए, जिनको मैं प्यार करता था। जब छड़ी के सहारे चलता था, तो शुरू-शुरू में एक-एक कदम आगे बढ़ना भी मुश्किल लगता था। ऐसा लगता था कि पता नहीं कब कौन सी चीज टकरा जाए, शायद कोई नुकीली चीज़ मेरे लग जाएगी। सीढ़ियों पर जाता था तो ऐसा लगता था कि पता नहीं कब गिर जाऊंगा, कब सीढ़ियां खत्म हो जाएंगी। ज़मीन पर चलते-चलते अगर हल्का सा झटका भी लगता था तो डर से भर जाता था, पता नहीं कब पैरों के नीचे से ज़मीन सरक जाए और मैं हजारों फीट नीचे गिर कर मर जाऊं।  कई बार ऐसा लगाता था कि काश! यह कोई ऐसा टास्क होता, जिसमें दो-तीन दिन, 1 हफ्ते या महीने भर देख नहीं सकते। तब कम से कम एक उम्मीद रहती...एक होप रहती कि कुछ वक्त बाद देख पाऊंगा। लेकिन यहां कोई होप नहीं है... मैं कभी नहीं देख सकता । जब हॉस्पिटल से आया, तो दुनिया इतनी तेज़ी से बदली कि जिसका कभी अंदाजा भी नहीं था। तीसरे दिन ही मौसी- मौसा जी बरेली वापस चले गए। जाने से पहले उन्होंने समझाया, "देखो बेटा अब ज़्यादा शोक ना मनाना.... 'होत वही जो राम रचि राखा', कल सुबह हम और तुम्हारे मौसा जा रहे हैं। लेकिन चिंता ना करना, सब खबर लेते रहेंगे तुम्हारी और कभी जरूरत पड़े तो बता देना हाज़िर हो जाएंगे। जो लोग एक-एक महीना पूरे परिवार के साथ रहकर जाते थे, वो एक हफ्ता भी नहीं रुके। बस इसलिए, क्योंकि तब ऐसे बहुत से काम थे जो मैं नहीं कर पाता था । लेकिन तब संजना ने बहुत कोशिश की मेरा साथ देने की। संजना और दोस्त ही मेरी फैमिली थे... वह मुझे बाहर ले जाते थे, रास्ता याद कराते थे, मुझे पार्क में घूमते थे, मेरे साथ वक्त बिताते थे। संजना ने मुझे बहुत सपोर्ट किया शुरू में, मेरा हर छोटा-बड़ा काम वह अपनी फर्स्ट प्रायोरिटी पर करती थी। लेकिन धीरे-धीरे चीज़ें बदलने लगीं...मुझे भी एहसास होने लगा कि मैं एक बोझ बनता जा रहा हूं...ढ़ाई साल पुराना रिश्ता एक महीने भी नहीं चला।  एक रात मुझे पेशाब लगा, मैंने उसे उठाया "संजू- संजू", वह गहरी नींद में थी। मैंने अपनी छड़ी टटोली, चलता हुआ बाथरूम में गया... पेशाब करके आया और सो गया।  सुबह जब आंख खुली तो वह मेरी छाती को ज़ोर-ज़ोर से पीट-पीटकर रो रही थी। मैं घबरा गया, बहुत दहशत भर गई थी मेरे अंदर... कि क्या हुआ?  वह इतना रो क्यों रही है ? मैं बार-बार उससे पूछ रहा था कि "क्या हुआ बेबी? संजू क्या हुआ?" मैं उसके आंसू भी नहीं पोंछ सकता था। उसका रोना मुझसे सहन नहीं हो रहा था। उसने बताया कि मैं बाथरूम की जगह किचन में पेशाब कर आया हूं। उस दिन मैं सच में दुखी था। जो कुछ भी हुआ उसकी वजह से नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि मैं उसके आंसू भी नहीं पहुंच सकता था। वह काफ़ी देर तक रोती रही, मैं उसे चुप कराने की कोशिश करता रहा। तब मुझे एहसास हुआ कि यह मेरी दुनिया है...  जो बदल गई है, अब मुझे सब अकेले ही करना है।

शाम को मैंने उससे कहा, "सुनो! मुझे लगता है कि अब तुमको आगे बढ़ जाना चाहिए, मेरे साथ तुम्हारा कोई भविष्य नहीं है।  उसे लगा जो कुछ सुबह हुआ, उस वजह से मैं यह कह रहा हूं। उसने कहा, "तुमको मैंने जो सुबह कहा उसका इतना बुरा लगा, तो मैं सॉरी बोलती हूं"।
मैंने समझाया "हमारे बीच अब सब चीजें बदल गई हैं...मेरी और तुम्हारी दुनिया का रंग बदल गया है।
सुनो... मैं हर परिस्थिति के लिए तैयार हूं। हमने बड़े ही सम्मान से एक दूसरे को अलविदा कह दिया। उस वक्त मुझे जो भी छोड़ कर गया, उसने वादा किया कि वह जरूर आएगा। लेकिन आज तक कोई एक बार भी मिलने नहीं आया। जो दोस्त चले गए, वह हमेशा के लिए चले गए। लेकिन जो नहीं गए वह किसी भी सूरत-ए-हाल में नहीं गए। योगी, चेतन और राजेश, यह कभी मुझे छोड़कर नहीं गए। राजेश पिछले महीने तक बिजनेस के प्रॉफिट में मेरा हिस्सा भेजता रहा।  लेकिन फिर मैंने उसे मना कर दिया कि बिजनेस में अब मैं पार्टिसिपेट नहीं कर रहा हूं, तो अब मेरा कोई हिस्सा नहीं है। मैं अंधा हूं संध्या...लाचार नहीं। मैं एक बॉक्सर हूं... मैं कभी हार नहीं मानूंगा।

संध्या ने कहा "और तुम कभी हारोगे भी नहीं, मुझे भरोसा है"।
"कॉफी पियोगे?"
सुबह हो गई थी... चिड़ियों के चहचाहने की आवाज़ आ रही थी, दरवाजे पर दूध वाले भैया भी आ गए थे। कॉफी पीने के बाद उसने याद दिलाया कि 10:00 बजे डॉक्टर के पास जाना है।  संध्या कई बार अपने हाथ से खाना बना कर लाती थी मेरे लिए। आज ब्रेकफास्ट उसने ही बनाया था और सच में ब्रेकफास्ट बहुत यम्मी था। ब्रेकफास्ट खाते हुए मुझे याद आया, "ओ माय गॉड!  तुम मुझे पहले से जानती थीं, इसलिए मुझसे म्यूज़िक सीखने आई। है ना, संध्या।
"क्यों, तुमको ऐसा क्यों लगा?" मैंने कहा, "नहीं, बस ऐसे ही"। वह हंसते हुए बोली, "अरे नहीं पागल, मैं सच में सीखना चाहती थी और तुमने जितना फास्ट मेरे पड़ोसी के लड़के को सिखाया था, मैं उससे इंप्रेसड थी बस इसलिए और फिर तुम इतने अच्छे हो कि तुम से दोस्ती हो गई।
अब चलो, वरना लेट हो जाओगे।
रास्ते में मुझे एहसास हुआ कि कोई डॉक्टर की बिल्डिंग की लिफ्ट में बंदूक के साथ जा रहा है और वह डॉक्टर को गोली मारेगा। मैं फिर से घबरा गया, मुझे यह सच में हकीक़त लग रहा था। मैं पसीने से लथपथ था, मेरे दिल की धड़कन भी बहुत बढ़ गई थी। मैंने संध्या से कहा, "गाड़ी साइड में लगाओ"...संध्या मेरी हालत देख कर घबरा गई। मैंने कहा, "डॉ० प्रिया को कॉल करो प्लीज...कॉल करो तुरंत... मुझे बात करनी है।
संध्या ने कहा "पर क्या हुआ?  हम चल तो रहे हैं"।
मैंने कहा, "प्लीज... प्लीज संध्या,  कॉल करो उसे"।
 संध्या ने कॉल किया, डॉक्टर ने जैसे ही कॉल रिसीव किया मैंने संध्या से फोन ले लिया, मैंने कहा "डॉक्टर, हेलो... सुनिए अपने केबिन को अंदर से लॉक कर लीजिए प्लीज... मैं संध्या का फ्रेंड अमित बोल कर रहा हूं...आपके ऑफिस में एक आदमी बंदूक लेकर आप को मारने आ रहा है"।
 डॉक्टर फोन पर कोई रिएक्शन देती, उससे पहले ही उसके ऑफिस में दो गोलियों की आवाज आई... शायद उसके हाथ से फोन छूट गया था... मुझे फोन पर बहुत सारा शोर सुनाई दे रहा था। मैंने तुरंत संध्या से पुलिस को कॉल करने के लिए कहा। जब हम डॉक्टर प्रिया के क्लीनिक पहुंचे, तो पता चला कि उसने दो चौकीदारों को गोली मारकर घायल कर दिया था।  पुलिस ने मौके पर पहुंचकर पिस्टल वाले को हिरासत में ले लिया।  मैं बाहर ही था। संध्या अंदर डॉक्टर से मिलकर आई क्योंकि डॉक्टर उसकी दोस्त थी, तो संध्या का उससे ऐसी हालत में मिलना जरूरी भी था।
संध्या आई, उसने बताया, "प्रिया थोड़े शॉक में है...लेकिन ठीक है"।
संध्या ने मुझसे पूछा, "तुमको अटैक के बारे में कैसे पता चला?"
मैंने कहा, "मुझे नहीं पता..."

बुधवार, 18 मार्च 2020

मौका हमें नहीं मिलपाया



अफ़सोस तो सब जताते हैं
दिल की तक़लीफ़ भी दिखाते हैं
एक अदालत है हम सबके सीने में
उसमें कुछ पल का मुक़दमा भी चलाते हैं
अफ़सोस तो हम सब जताते हैं

यहां दिल के कटघरे में पेशी होती है सभी की
यहां सभी मुल्ज़िम करार भी दिए जाते हैं
सज़ाएं भी सबको तुरंत सुना दी जाती हैं
समाधान भी सब निकल आते हैं
फिर भी अफ़सोस तो हम सब जताते हैं

क्या मंत्री और क्या प्रधानमंत्री, सबको लाइन में लगाते हैं
जब व्यवस्था पर बात आती है, तो सब को समझाते हैं
बुद्धिजीवियों की तरह ज्ञान बरसाते हैं और भाषण भी सुनाते हैं
बस यूं ही एक रात में बदलाव चाहते हैं


सुनो तुम समझ लो तुम को क्या करना है
मुझसे सवाल ना करना कि मैंने क्या किया है
जितना मेरे बस में था उससे कहीं ज़्यादा किया है
चलो एक चाय पिलवाओ फिर आगे का क़िस्सा सुनाते हैं

देश की समस्याओं पर कुछ बात चलाते हैं
चाय के साथ व्यवस्था का गाना गाते हैं
व्यवस्था तो ऐसी ही है और इसी में हमको जीना है
लेकिन चौड़ा अपना सीना है
क्योंकि अब ये ज़हर तुम को पीना है

कान इधर लाओ कुछ पते की बात तुमको बताते हैं
परिवर्तन तो हम सब चाहते हैं
लेकिन ख़ुद में कितना बदलाव लाते हैं
क्रोध तो हमको बहुत आता है
दिल बड़ी ज़ोर से बदलाव चाहता है

ज़िन्दगी गुज़ार दी हमने इसी आस में
अगर ये ताक़त होती पास में
दुनिया को हम सिखाते
कि देश को कैसे हैं चलाते
 बस यही चुनाव कभी हो नहीं पाया
जनता का जमावड़ा कभी हमारे घर नहीं आया
जनता का जमावड़ा कभी हमारे घर नहीं आया...

बुधवार, 11 मार्च 2020

मुश्किल नहीं है कुछ भी

मुश्किल नहीं है कुछ भी इस जग में
मुश्किल नहीं है कुछ भी इस जग में
जो तू ठान ले एक बार अपने मन में
तूफानों को तेरी एक फूंक उड़ा देगी
चट्टानों को तेरी मेहनत पिघला देगी

तू सर्वश्रेष्ठ रचना है उस ईश्वर की
उठ खड़ा हो और ललकार
चल बहुत हुआ अब भर हुंकार
तुझसा बड़ा वीर कौन है इस धरती पर

एकलव्य है तू ख़ुद को कर केंद्रित
बाधाएं क्यों देखता है मूर्ख नहीं है तू
समाधान है आसपास ही,  देख सही
तू है वही वीर जो गिरता है

रेंगता है कुछ क्षण युद्ध भूमि पर
समझाता है ख़ुद को हर बार फिर लड़ता है
जब तक लक्ष्य नहीं कर लेता मुट्ठी में
मुश्किल नहीं है कुछ भी इस जग में
मुश्किल नहीं है कुछ भी इस जग में...

रविवार, 23 फ़रवरी 2020

दो नाव

मैं रोज़ सोचता हूं कि सिगरेट छोड़ दूंगा, लेकिन क्लास के बाद पता नहीं क्यों सिगरेट की ऐसी तलब लगती है कि सीधा बाहर सिगरेट पीने दौड़ता हूं। अब या तो क्लास इतनी बोझिल होती है या फिर मुझे लत लग गई है, शायद लत ही लग गई है। कुछ दिन अगर ये सिगरेट छूट भी जाए तो ये दोस्त छूटने नहीं देते। एक-आध कमीना ऐसा निकल ही आता है जो आपको ये बोल कर साथ ले ही जाएगा,
"अबे चल ना सिगरेट छोड़ कर भी क्या कर लेगा" 
"कल से छोड़ लियो" 
"आज चल, आज तेरा भाई पिला रहा है"
लेकिन उस दिन अकेला ही था। एक दोस्त सामने वाली नाई की दुकान पर बाल बनवा रहा था, तो दूसरा पहले से ही पास वाली दुकान पर चाय पी रहा था। मैंने दद्दू की दुकान से सिगरेट ली और पीनी शुरू की, वहां उसको देखा... उसने मुझे देखा... तो मैंने कहीं और देखा... अब फिर जब मैंने देखा... तो उसने कहीं और देखा। 
वैसे तो मैं चाय पीना पसंद नहीं करता, लेकिन अब मैंने एक चाय भी खरीद ली और अपने दोस्तों के पास जाकर बैठ गया जो पहले से वहां बैठ के चाय पी रहे थे। 
चाय पीते-पीते हम दोनों ने आंखों-आंखों से करीब 25-30 बार पकड़म-पकड़ाई खेली।
एकदम पतली सी माथे पर चोट का निशान और शरारत भरी उसकी आंखें, आंखों से खेलना बहुत अच्छे से जानती थी वो। हमारा क्रिकेट शुरू हो गया था, अब देखना था कि आउट पहले कौन होता है...ना वह आउट हो और ना हम... आंखों-आंखों का खेल खत्म हो तो बातचीत पर भी आएं। अब तो सिगरेट और चाय भी खत्म हो गई थी, उसकी सहेली भी जाने को तैयार थी और मेरे दोस्त भी। तो आउट होना मंजूर नहीं था, इसलिए हम वहां से निकल गए। टाइम नोट किया कि शायद वह कल यहां आए तब आएंगे...12:15 दोपहर के थे।
वैसे मेरी गर्लफ्रेंड है लेकिन पता नहीं क्यों मैं उसकी तरफ खिंचा चला गया ।
अगले दो-तीन रोज़ तक उसी वक्त पहुंचा पर वह नहीं आई, फिर अचानक लगभग हफ्ते भर बाद वह जूस की दुकान पर मिली। हमारी नजरें फिर मिलीं, मुझे थोड़ी सी घबराहट हुई कि इतना नज़दीक से क्रिकेट शुरू ना कर दे...मैं इतना नज़दीक से नहीं खेल पाता...लेकिन उसने नजरें झुका लीं...मानो पहली ही बॉल पर आउट और हम ने सीधा सिक्सर मारा बाउंड्री के बाहर।
जूस वाले भैया ने पूछा,
"मैडम कौन सा"
मैडम बोली "मैंगो शेक"  
जूस वाले ने हम से पूंछा, "भईया आज कौन सा बनाएं"
"मैंगो" मैंने उसी की तरफ एक नज़र घुमा कर कहा।
आम फलों का राजा क्यों होता है पता है?
देखा जूस वाले की तरफ लेकिन सवाल मैडम से था।
"नहीं भईया" जूस वाले ने कहा
और मैडम ने उत्सुकता भरी निगाहों से देखा...
बस बातें करने का मौका मिल गया और नज़रें झुका कर के तो हमारी सत्ता वो पहले ही स्वीकार कर चुकीं थी।
उसकी मुस्कुराहट बड़ी मीठी सी थी।
मेरी हर बात पर वह हंसती थी, थोड़ा कम बोलती थी लेकिन गाड़ी पटरी पर आ रही थी। उसके साथ बातें करने में, वक्त गुजारने में, मुझे मज़ा आता था...एक रोमांचक एहसास होता था...दिल की धड़कन थोड़ी अलग सी धड़कती थी और उसके परफ्यूम की खुशबू तो एकदम नशीली थी। 
लेकिन दिल में एक अजीब सा डर था, वह डर इसलिए था क्योंकि मेरी गर्लफ्रेंड थी, मेरे गांव में। 
ऐसा नहीं था कि मैं उससे प्यार नहीं करता था, उसके बिना तो मैं अपनी जिंदगी की कल्पना भी नहीं कर सकता था। लेकिन अब, मैं दो नावों में सवार हो चुका था।
यहां मेरी एक जिंदगी थी और वहां मेरे गांव में दूसरी।
हमने कई बार अकेले वक्त गुजारा था, लेकिन कभी भी रिचा के साथ किसी भी तरह का जिस्मानी रिश्ता बनाने की मेरी हिम्मत नहीं हुई। एक दो बार उसने पहल भी की, लेकिन मैं ख़ुद ही पीछे हट गया।
ऐसा नहीं है कि मैं बहुत अच्छा हूं या सत्यवान हूं... कभी-कभी सोचता हूं कि अगर इतना ही अच्छा होता तो सरस्वती को धोख़ा देकर रिचा की तरफ एक नए रिश्ते की शुरुआत ही नहीं करता, लेकिन मैंने ऐसा किया था। सरस्वती से रोज़ बात होती थी, उसको सब बताता था... रिचा के बारे में भी बताया था लेकिन सिर्फ इतना कि रिचा अच्छी दोस्त है, लड़कियों के पास शायद सिक्स सेंस होता है, इसलिए सरू से चाहे किसी भी लड़की के बारे में बात कर लो उसे कोई दिक्कत नहीं थी, बस रिचा का नाम सुनते ही वह पता नहीं क्यों चिड सी जाती थी।
अपने ख़्यालों में तो मैं रिचा के साथ भी बहुत कुछ कर गया था, लेकिन उन ख़्यालों को हकीक़त बनाने की हिम्मत कभी नहीं हुई ।
 इन 4 महीनों में रिचा ने मुझे इतना जान लिया था जितना सरु को जानने में 4 साल लग गए थे । रिचा ने अपने जन्मदिन की पार्टी दी थी, पार्टी में उसके सारे दोस्त आए थे लेकिन वो सिर्फ मेरे साथ ही अपना वक्त बिताना चाहती थी। इसलिए अपने सारे दोस्तों को ख़ुद की पार्टी में छोड़ कर मेरे पास आई और बोली,
"यार यहां मन नहीं लग रहा है, मुझे कहीं बाहर ले चलो" मैंने पूछा "कहां चलोगी यहां पर सारे दोस्त हैं तुम्हारे, तुम ही पार्टी से चली जाओगी तो उनको अच्छा नहीं लगेगा"।
 वह बोली "उसकी चिंता तुम छोड़ो और यहां से बाहर चलो"।
 मेरी बाइक पर हम दोनों यूं ही दिल्ली की सड़कों पर निकल गए। मोटरसाइकिल पर मेरे पीछे मुझसे इतना सट कर बैठी थी कि उसके दिल की धड़कन तक महसूस हो रही थी और सीट पर पीछे इतनी जगह थी कि 2 लोग आराम से सीट पर आ जाएं। उसने एक बीयर बार देखा और गाड़ी रुकवा दी, वह मेरे साथ लगातार चार बियर की केन के बॉटमसिप गटक गई लेकिन बिल्कुल भी लड़खड़ाई नहीं। हम वहां से बाहर निकले और रात के 11:30 बजे बाहर घूमने लगे, कनॉट प्लेस की सड़क पर मेट्रो गेट नंबर 7 की सीढ़ियों के बाहर बेंच पर बैठे थे।
 मैं बिल्कुल शांत उसे देख रहा था, दुकानें सारी बंद हो गई थीं, पूरी सीपी में सन्नाटा था, इधर-उधर कोई एक आदमी दिखाई दे जाता था बस। मैंने कहा चलो कहीं और चलते हैं, "आई थिंक! दिस इज़ नॉट सो सेफ"।
वो एकटक मेरी आंखों में देखती रही और थोड़ा सा सरक कर मुझे कस कर गले लगा लिया, काफी देर तक बिना कुछ बोले मेरे कंधे पर अपना माथा टिका कर बैठी रही। मैंने पूंछने की कोशिश की, तो मुझे "शश" कर उसने चुप करा दिया। थोड़ी देर बाद धीरे-धीरे अपना चेहरा ऊपर किया इस तरह जैसे अपना सिर उठाने के लिए भी ताकत मुझ से ही उधार ली हो, उसकी उंगलियां मेरे बालों और गर्दन पर धीरे धीरे नाच रहीं थी। धीरे से उसके होंठ न जाने कब मेरे होठों के करीब आ गए,
मैंने उसे  रोका "आं! तुम को कुछ बताना है",
उसने कहा "शू..श...कुछ मत बताओ तुम्हारी आंखें सब बता देती हैं, तुम्हारी जिंदगी में कोई और भी है मुझे पता है"अपने दोनों हाथों में मेरा चेहरा पकड़े हुए उसने मेरी आंखों में आंखें डाल कर कहा। 
इससे पहले कि मैं फिर कुछ कहता उसने मेरे होठों पर अपनी उंगली रख दी, बोली "आज कुछ मत कहना... प्लीज" और मैं कुछ भी नहीं कह पाया। मैं ये नहीं कहूंगा कि उसने मुझे किस किया, हम दोनों ने बहुत देर तक एक दूसरे को प्यार किया... अचानक उसी वक्त उससे एक और जुड़ाव हो गया। यह कोई आम साधारण लड़की नहीं है जो मुझे किसी और के साथ होते हुए भी एक्सेप्ट कर रही है और पता नहीं कब से जानती थी वो इस बात को। 
एक अलग सा जुनून था उस वक्त हम दोनों में, पता नहीं कब हम दोनों मेरे फ्लैट पर पहुंचे । सुबह आंख खुली तो पाया कि मेरे बिस्तर में वह मुझसे लिपट कर सो रही थी। हमारे बीच सब ठीक था। लेकिन उस रात के बाद मेरे और सरू के बीच चीज़ें बदलने लगी थी, मुझे उससे बात करने में झिझक होती थी, गांव जाता था तो उससे नज़रें मिलाकर बात नहीं कर पाता था। 
मेरी इंजीनियरिंग का आखरी साल था। कॉलेज में प्लेसमेंट के लिए कम्पनियां आ रहीं थी, लेकिन मैं अभी भी सरू और रिचा के बीच फंसा था । इंटरव्यू में जवाब आते हुए भी मैं इंटरव्यूअर्स के सवालों के जवाब नहीं दे पाता था । उस रात को 2 महीने बीत चुके थे और रिचा मेरी हालत भी समझ रही थी। इसलिए उसने मुझे एक दिन इस बारे में बात करने के लिए बुलाया,
"देखो आदि मैं समझती हूं कि तुम सरस्वती से बहुत प्यार करते हो और मुझ से भी, लेकिन जैसा कि तुम मुझे पहले ही बता चुके हो कि सरू तुमको किसी से नहीं बांट सकती और  तुम्हारी ऐसी हालत मुझ से देखी नहीं जा रही। मुझे सरू से कोई दिक्कत नहीं है, लेकिन तुम्हें किसी एक को ही चुनना पड़ेगा और इस बारे में जल्दी ही सोचना होगा क्योंकि मेरी चेन्नई में प्लेसमेंट हो गई है और मेरी कल सुबह की फ्लाइट है। आदि मैं तुमको खोना नहीं चाहती...तुम्हारे जवाब पर ही डिपेंड करता है कि मैं चेन्नई जाऊंगी या नहीं, तुम क्या चाहते हो" ?
मैं उसकी बातों से अंदर तक घबरा गया था कि दोनों में से किसी एक को चुनना पड़ेगा।
मैंने कहा,
"सरू...
उसने वही पहले वाली स्माइल दी जो पहली दफा जूस की दुकान पर दी थी, अपना बैग उठाया, गाल पर हल्के से किस किया और चली गई ।
मैं उसे बता रहा था,
"सरू! मैंने कल रात सरू को हमारे और उस रात के बारे में सब बता दिया, सरू ने मुझसे सारे रिश्ते ख़त्म करके मुझे सजा दे दी है"।
कनॉट प्लेस के उस कैफे में, मैं उस खाली कुर्सी से बात कर रहा था जिस पर कुछ देर पहले तक रिचा बैठी थी। वेटर ने आकर कहा, "सर आपका ऑर्डर, टू लाटे"।
मैं अचानक जैसे ख़्याल से टूटकर बोला, 
"क्या" ?
सामने देखा तो सिर्फ ख़ाली कुर्सी थी, वेटर ने एक कप खाली कुर्सी के सामने रखा और दूसरा मेरे... 

रविवार, 3 नवंबर 2019

एक जैसा ग़म (दर्द विस्थापन का)

जब भी कोई मुझसे सवाल पूछता है कि मैं कौन और कहां से आया हूं, मतलब कहां का रहने वाला हूं तो यह सवाल मुझे बहुत अखरता है।
अपनी मिट्टी अपने गांव को छोड़ना कैसा होता है... यह मैं ही जानता हूं। बेशक मैं जहां रहता था, वहां आए दिन नारे लगते थे, पथराव होते थे, गोलियों की आवाज़ें आती थी। लेकिन हमें आदत थी।
घाटी में जब बर्फ़ पडती थी, तो ऐसा लगता था कि आसमान से फ़रिश्ते सफेद फूल बरसा रहे हैं। लेकिन शायद उनके कानों तक गोलियों की आवाज नहीं पहुंचती थी... अगर पहुंचती तो वह ज़रूर कुछ करते ।

वो हमारा घर था। सच में जन्नत कहीं थी तो वहीं थी। 20 साल का था, जब पहली बार किसी लड़की को देखा और देखता रहा... सेब जैसे उसके गाल, लंबे गोल चेहरे पर उसकी बड़ी बड़ी आंखें... इतनी खूबसूरत लगती थी कि जैसे किसी चित्रकार ने अपनी ख़ास पेंसिल से उन्हें बनाया हो । इससे खूबसूरत आखें दुनिया में थी ही नहीं और उसकी आंखों पर वह एक बड़ा सा गोल चश्मा, जो पूरी शिद्दत से उसकी आंखों की रख़वाली करता था एक पहरेदार की तरह, खूबसूरती इतनी की घाटी की बर्फ भी उसके आगे सांवली सी नज़र आती थी ।
उसे  देखते ही मेरे दिल में एम्बुलेंस की लाल बत्ती लुप-लुप करके जल उठती।  
पहली बार उसे प्रोफ़ेसर सिद्दीकी के यहां देखा था, वो अक्सर जूनियर्स की कापियां जांचने के लिए मुझे बुला लिया करते थे। 
 अब तो रोज़ किसी न किसी बहाने से मैं सही वक्त पर पहुंच जाता था। थोड़ी देर उसे देखता, ट्यूशन खत्म होने का इंतजार करता और फिर उसे देख कर घर वापिस,
रात भर तकिए को सीने से लगा कर सोता था। धीरे धीरे सफ़ीना को भी मैं पसंद आने लगा था, उसकी पढाई में मदद करता था। शायद प्रोफ़ेसर साहब को भी अंदाज़ा हो  गया था कि क्यों मैं रोज़ उनके घर पहुंच जाता हूं,पर प्रोफ़ेसर साहब इस बात को नज़रंदाज़ कर देते थे। धीरे-धीरे हम दोनों ने ही बाहर मिलना शुरू कर दिया, लेकिन एक दिन प्रोफ़ेसर साहब ने सफ़ीना और मेरी नज़दीकी को देखते हुए मुझे समझाने की कोशिश की। उन्होंने कहा कि, हम दोनों के मज़हब अलग-अलग हैं और घाटी में अगर हमारी नज़दीकी की भनक किसी को भी पड़ गई तो इसका कुछ भी अंजाम हो सकता है...अभी माहौल ठीक नहीं है, मुझे इस बारे में सोचना चाहिए। मैंने उनसे कहा कि सफ़ीना और मैं एक दूसरे के सिर्फ अच्छे दोस्त थे।
वो इज़हार करने से शायद डरती थी और मैं उससे डरता था कि कहीं वो मुझे ग़लत अर्थों में ना ले ले।

हवाएं गर्म हो रही थी और हमारे दिलों की धड़कनें भी ।
हमारी बिरादरी के लिए फरमान जारी हो गया था कि हमें यहां से जाना होगा। आए दिन पत्थरबाज़ी और नारों से हम भी तंग आ गए थे, लेकिन वहां से जाना नहीं चाहते थे। आए दिन खबरें आती थी कि आज इसे घर में घुस कर मार दिया, आज उसे मार दिया । माँ बताती थी कि उस की बीवी तो पेट से थी, उसका छोटा बच्चा था और ना जाने क्या क्या... पर हमें परवाह नहीं थी। हम तो अपनी तय जगह पर मिलने के लिए तय वक्त पर पहुंच जाते थे। 
असल में हमें रोज़-रोज़  के शोर की आदत हो गई थी, गोली की आवाज से पता चल जाता था कि किस गन की है और कितनी दूर से चली है।
मैंने रास्ते में कुछ जंगली फूलों का गुलदस्ता बनाया और सोचा कि आज सफ़ीना को बोल दूंगा कि सफ़ीना मैं अपने रोज़-रोज़ मिलने वाले इस रिश्ते को एक नाम देना चाहता हूं। वो जैसे ही मेरे सामने आई मैं वो सब भूल गया जो मैंने तैयार किया था। मैं किसी और ही दुनिया में था, मैंने फूलों से भरा हुआ गुलदस्ता उसके आगे किया और कहा "हम रोज मिलते हैं हर हाल में, हम दोनों को एक दूसरे का साथ पसंद है, मैं... मैं तुमसे प्यार करता हूं सफ़ीना... और सफ़ीना एक दम से मेरी बाँहों में आ गिरी, एकदम निढाल होकर, मैं हम दोनों को सम्भाल नहीं पाया और हम दोनों गिर गए। वो मेरे ऊपर थी और मैं नीचे, मेरा हाथ उसकी पीठ पर गया तो उसकी पीठ गीली थी। अचानक मुझे एहसास हुआ कि आसपास गोलियां चल रहीं थी और एक गोली मेरे दाहिने कंधे पर भी लगी थी।अब  एहसास हुआ था। सफ़ीना बेहोश हो गई थी, मैं उसे साथ लेकर एक पेड़ की आढ़ में छिप गया। सफ़ीना को जगाते-जगाते मैं पता नहीं कब बेहोश हो गया ।

होश आया तो मैं एक ट्रक की लॉरी में घर के कुछ सामान, मां और दोस्तों के साथ था। कुछ पड़ोस के लोग भी उसी लॉरी में थे। दोस्तों ने बताया कि सफ़ीना नहीं बची और जो थोड़ा बहुत सामान था वह लेकर उन्होंने मुझे और माँ को साथ ले लिया। मैंने वापिस जाने की बहुत कोशिश की लेकिन दोस्तों ने जाने नहीं दिया, फिर घर में मेरी अकेली माँ का मैं ही तो एक सहारा था।  अगर मैं भी चला जाता तो परदेस में माँ का ख्याल कौन रखता। 
हम दिल्ली आए एक पुल के नीचे झुग्गी डाली और रहने लगे। सफ़ीना की याद मुझे बार-बार वहीं अपने पास बुलाती थी, लेकिन पता था कि सफ़ीना अब वहां नहीं है।

फिर 11 महीने बाद साल 1951में सफीना मुझे दिखाई दी, वहीं पास ही की एक झोपड़ी में। 
मुझे यकीन नहीं हुआ कि मेरी सफ़ीना ज़िंदा है। मुझे एक पल की भी सुध नहीं रही और मैं उसके नज़दीक पहुंच गया... मैंने कहा सफ़ीना- उसने कोई जवाब नहीं दिया। मैंने फिर कहा सफ़ीना सुनो... वो मेरी तरफ मुड़ी, मुझे देखा और बोली, क्या...?  मैंने देखा कि उसके दाएं गाल पर तिल था, जो सफ़ीना के नहीं था। मैंने कहा, सॉरी...आपका चेहरा मेरे किसी ख़ास से बहुत मिलता है। उसने मुझे शक भरी निगाहों से देखा, जैसे मैं कोई लफंगा हूं और उसे छेड़ रहा हूं... फिर बिना कुछ बोले मुड़ी और चली गई। एक दो दिन बाद वो फिर राशन की दुकान पर मिली ।  मैं उसे देख कर वहीं खड़ा का खड़ा उसे  देखता रहा। उसकी शक्ल सफ़ीना से इस हद तक मिलती थी कि अगर उसके गाल पर तिल ना हो तो कोई दोनों में फर्क ही नहीं कर सकता।
मुझे एहसास हुआ कि उसने उसको देखते हुए मुझे पकड़ लिया है,
 मैं नज़र चुरा कर निकल ही रहा था कि उसने मेरे पीछे से कहा "सुनो, उस दिन किस नाम से बुला रहे थे मुझे, क्या कोई बहुत ख़ास थी?" 
अब मैं समझ नहीं पा रहा था कि उससे क्या बात करूं ? क्या कहूं ?

उसका भी ग़म मेरे ग़म जैसा ही था। वह भानगढ़ गांव से आई थी, गौरी नाम था। वो भी मेरी ही तरह विस्थापित थी, अपने घर - गांव से बिछड़ कर यहां राजधानी में आई थी। हम दोनों के बीच खूब बातें होने लगी, वो अपने किस्से सुनाती और मैं अपने। उसने बताया कि वो अपने गांव के एक लड़के से प्यार करती थी । घर वाले शादी के लिए राज़ी नहीं थे। भाग कर शादी करने का प्लान बनाया था दोनों ने, लेकिन तभी इनका पूरा का पूरा गांव विस्थापित हो गया। गौरी की कहानी फिर कभी... अभी तो हम दोनों को हमारा ग़म- जिंदगी बांटने के लिए एक दूसरे का साथ मिल गया था। लेकिन हमारे वतन की मिट्टी की खुशबू यहां राजधानी में नहीं आती थी।

गुरुवार, 10 अक्टूबर 2019

मधु

उसके बाप की गांव में एक दुकान थी । पश्चिम बंगाल में हमारा एक छोटा सा गांव हुगली, इस छोटे से गांव में हमारी एक छोटी सी दुनिया। बचपन से मैं और मधु साथ खेलते हुए बड़े हुए थे, मधु का बाप उसे मेरे साथ कहीं भी जाने से नहीं रोकता था ।
वह उम्र में मुझसे एक साल बड़ी थी और दो क्लास आगे, मैं दसवीं में था और वह बारहवीं में।
वह कई बार मुझे चिढ़ाने के लिए बोलती "देख मेरा बापू तेरे से मेरी शादी नहीं करेगा", "तो मैं पूंछता क्यों नहीं कराएगा" ?
वो कहती "क्योंकि तू कीचढ़ सा काला और मैं नदी के जल सी साफ, ऊपर से तू मेरे से एक साल छोटा, कक्षा में दो साल पीछे...इस पानी की तरह मुझे भी बहुत दूर... सागर से मिलने जाना है और सागर में ही समा जाना है, भूपा...तेरा मेरा मेल कहां" उसके इस मज़ाक पर मैं गुस्से में उससे पूंछता तेरे बाप की छोड़, "तू बोल तुझको क्या करना है" तो मधु कहती, 'अरे बापू के आगे मेरी क्या चलेगी अब मां के मरने के बाद बापू ने हीं तो पाला है मुझे, जो उनका फैसला वह मेरा फैसला' और मैं जैसे ही नाराज होकर जाने को होता, वह मेरा हाथ पकड़ लेती लेकिन मैं हाथ छुड़ाकर चल देता, तो सामने मेरा रास्ता रोक कर खड़ी हो जाती और कहती 'अरे भूपेश बाबू, मेरा सागर तो तुम हो' आंख मारती और गले में हाथ डालकर पूरे जंगल की सैर करती।
 हम दोनों नदी के जल में एक दूसरे का हाथ पकड़ कर घंटों लेटे रहते, हमारे आसपास पूरे बदन को छोटी-छोटी मछलियां आकर छूती।
अगर कोई मछली उसे छूती, तो मुझे पता चल जाता और अगर कोई मछली मुझे कहीं भी छूती, तो उसे पता चल जाता।

उसको कटहल बहुत पसंद था, इसलिए चाचा के घर से पका हुआ कटहल चुपचाप पेड़ से चुरा कर लाता और हम दोनों जंगल में बड़े मज़े से कटहल खाते। मैं उसे घुठली के ऊपर का गूदा निकाल कर देता और वह अपने हाथों से खुद भी खाती, मुझे भी खिलाती।
फिर शाम को साइकिल से अपने बाप की दुकान पर जाती और उसका दुकान में हाथ बटाती।
हम दोनों के साथ होने से उसके बाप को कोई दिक्कत नहीं थी, लेकिन उसके बाप की परेशानी का कारण था मेरी लापरवाही।
 मुझे पढ़ने में मजा नहीं आता था। पहले मैं और मधु एक ही कक्षा में थे, लेकिन मैं दो बार फेल हो गया। अब जंगल में वह मुझे पढ़ाती भी थी, इसलिए मैं पिछली तीन कक्षाओं में पास हो गया, लेकिन अब मैं भी मेहनत करता था, क्योंकि मैं नहीं चाहता था कि मधु का मज़ाक कभी सच हो...उसका समुद्र तो सिर्फ मैं हूं। लेकिन मधु की सौतेली मां और चाचा को मैं पसंद नहीं था, इसलिए नहीं क्योंकि मैं नाकारा हूं बल्कि इसलिए क्योंकि मैं मधु की खुशी था और मधु की खुशी उसकी किस्मत को भी बर्दाश्त नहीं थी ।

मैं जामुन के पेड़ के पास उसका रोज़ इंतज़ार करता था और फिर हम साथ में स्कूल जाते, अभी परीक्षाएं चल रही थी।
उस दिन मैंने बहुत देर तक उसका इंतजार किया लेकिन जब वो नहीं आई तो मैंने उसके घर की ओर दौड़ लगा दी।
उसके घर पहुंचा... उसके दरवाजे के बाहर सफेद कफ़न पड़ा था और वो एकदम टूटी हुई बिना एक आंसू के जमीन पर बैठी बिना पलक झपके उस कफन को देख रही थी। मुझे एहसास हो गया था कि यह मधु का बाप है, मैं उसके पास पहुंचा और जैसे ही उसके बगल में बैठा तो तुरंत उसने मुझे कस कर पकड़ लिया और अब तक जो आंखें सूखी थी उन में बाढ़ आ गई थी, अपने सारे आंसू मेरी छाती से लगाए अपने चेहरे से मेरे सीने में उतार दिये।
अरे कल ही तो मधु के बाप ने हम दोनों को आशीर्वाद दिया था, मेरे से बोला अगर तुझे मधु चाहिए तो जल्दी से काबिल हो जा, मधु कल ही तेरी होगी और अगले दिन तो वह खुद ही इस दुनिया का नहीं रहा ।
मधु की 12वीं नहीं हो पाई लेकिन मैं बराबर परीक्षा देने गया जिस दिन मधु का बाप मरा वह एग्जाम मैंने फिर से दिया, मन में एक अजीब सा डर था कि अभी और भी कुछ भयानक होगा। मैंने काम करना शुरू किया मोटर मैकेनिक का, अच्छा पैसा मिल रहा था ।
एक दिन उस्मान आया और उसने बताया कि मधु जा रही है... मैंने पूंछा कहां? वो बोला उसकी शादी पक्की हो गई है। मैं दौड़ता हुआ उसके घर पहुंचा तो उसकी मां बोली...तू कोई काम धाम तो करता नहीं है, तुझसे क्यों लड़की बिहाएँगे? पता चला मधु की शादी और विदाई दोनों ही परसों है। लड़का दिल्ली में रहता है, मैंने कहा बात करने दो एक बार मधु से। मधु की कमरे के अंदर से ही बाहर बरामदे में आवाज आई - चला जा क्यों मेरे पीछे मरना चाहता है, जो मेरी मां का फैसला है वही मेरा।
 आवाज मधु की थी, शब्द भी उसके थे लेकिन इस बार मैं उससे नाराज नहीं था। मैं उसको खो दूंगा इस बात से मेरे पूरे शरीर में सिहरन उठ गई थी।
 मैं उसके कमरे की तरफ बढ़ा कि नहीं, मधु मैं तेरा समुद्र हूं... तुझ को मुझ में मिलना है... किसी और में नहीं। मैंने उसके चाचा को एक तरफ धकेला और उसके दरवाजे को पीटने लगा, बाहर से आवाज लगा रहा था, मधु... मधु... और जैसे ही उसने दरवाजा खोला पीछे से जोरदार झटका मेरे सिर पर लगा, मैं सीधा खड़ा का खड़ा पीठ के बल खुली आंखों से जमीन पर गिर गया। मधु रो रही थी, बुरी तरह चीख रही थी...और उसे देखते देखते मेरी आंखें बंद हो गई।
 जब आंख खुली तो पहला चेहरा मेरे सामने मेरी मां का था, मां ने बताया कि मैं पिछले तीन दिनों से बेहोश था।
उसी रात उन लोगों ने मधु को दिल्ली भेज दिया, असलम ने बताया की मधु के बाप को उसकी सौतेली मां और चाचा ने मिलकर मारा था क्योंकि उसकी मां और चाचा का चक्कर चल रहा था। दूसरा इन दोनों ने चुपचाप उसके सारे खेत, मकान, दुकान सब बेच दिया और दोनों गांव से फरार होने वाले थे। उस रात इन दोनों को मधु के बाप ने साथ में पकड़ लिया, तो इन दोनों ने उसको मार दिया, अब दोनों गायब हैं। सच कहूं तो इस बात से मुझे कोई मतलब नहीं था। मधु की शादी हो गई थी और वह मुझसे बहुत दूर जा चुकी थी। मैं मधु को पा नहीं सका लेकिन उसका सपना मुझे सच करना था। काबिल बनना था कि अगर कभी जिंदगी में मिली तो उसको गर्व होगा कि मैं उसके सपने के साथ जी रहा हूं। मैं गांव में अब और रह नहीं सकता था, यह बात मेरा बड़ा भाई भी समझता था। इसलिए उसने मुझे कलकत्ता भेज दिया, पढ़ाई के साथ यहीं काम भी करता था । कलकत्ता में 12वीं के बाद दिल्ली चलाया आया और टैक्सी चलानी शुरू कर दी। दिल में था कि शायद वह मिल जाएगी, कभी किसी सवारी की तरह ही सही।
दिल्ली में तीन साल काम करके मैंने एक खुद का छोटा सा मकान और खुद की गाड़ी ले ली, हालांकि इस सब के लिए लोन भी लिया था लेकिन यह सुकून था कि अपना है ।
एक दिन रात को सड़क किनारे हाथ में बच्चे को लिए एक औरत मेरी गाड़ी के आगे आ गई और मेरी तो खुशी का ठिकाना ही नहीं था। कितनी कमजोर हो गई थी वह, मैंने उसे संभाला... अपनी बाहों में लेकर अपनी कार में बिठाना चाहा तो उसने मुझे झटक दिया, जैसे मुझे पहचाना ही नहीं। मैंने उसे पकड़कर हिलाया और कहा 'मैं हूं मधु तुम्हारा भूपा', उसने नजर उठाई और फिर से उसकी बरसों से सूखी आंखों में बाढ़ आ गई। उसे अपने साथ घर लाया, उसने बताया कि किस तरह से उसे दिल्ली लाया गया और जहां उसको किसी सेठ के यहां बेच दिया गया... उसने मधु के साथ क्या-क्या नहीं किया, इसके बच्चा हुआ तो इसका बच्चा भी गिरवा दिया और मधु को किसी और को बेच दिया। इन तीन सालों में मधु को तीन बार बेचा गया और खुद को बचाते हुए वह किस्मत से मुझ से टकरा गई। वो इतनी डरी हुई थी कि डर से कांप रही थी... मैंने उसका हाथ पकड़ा हुआ था, उसने मुझे कस कर सीने से लगा लिया तकरीबन आधे घंटे तक। 
उसने कहा, भूपा मैं अपने समुन्दर में मिलना चाहती हूं। उसकी गोद में जो बच्चा था, वो बच्चा नहीं गुड़िया थी। जिसे शायद उसने अपना ग़म बांटने के लिए अपने सीने से लगा रखा था और इस घर में आने के बाद उसने एक बार भी उस चीज़ के बारे में नहीं पूछा।

हम दोनों की शादी को 2 साल हो गए, पिछले हफ्ते ही उसने हमारी बेटी को जन्म दिया और अस्पताल में मुझसे अपने आखिरी शब्द कहे... 
"मैं अपने समुद्र में मिल गई भूपा"

शुक्रवार, 4 अक्टूबर 2019

अब तुम से क्या शिकायत करूं

सोचा कुछ शिकायतें करूँ तुम से
कुछ दूर शिकायत के सफर पर
ऐहसास हुआ

कुछ बने- कुछ टूटे ख्वाब न हों
कुछ किससे जीत और हार न हों
किसी का प्यार और प्यार की मार न हो
कुछ खास और कुछ बकवास यार न हों
कभी खुशी कभी ग़म की बौछार न हो
कभी उदासी और कभी मुस्कान न हो
तो ज़िन्दगी क्या हो...? और कैसी हो...?

ऐ ज़िन्दगी, तुम जो हो, जैसी हो
बड़ी खूबसूरत, बड़ी हसीन हो,

चमन चतुर

  चमन चतुर Synopsis चमन और चतुर दोनों बहुत गहरे दोस्त हैं, और दोनों ही एक्टर बनना चाहते हैं. चमन और चतुर जहां भी जाते हैं, वहां कुछ न कु...